
Acharya Shri Umaswati
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Sutra
दुःखमेव वा ॥ १०॥
Meaning
अथवा हिंसादिक पांच पाप दुःखरूप ही हैं ॥ १०॥


भावार्थ
हिंसा आदि पाप दुःख रूप ही हैं ऐसी भावना रहना चाहिए। क्योंकि हिंसादि दुःख के कारण हैं इसलिए दुःख रूप ही हैं ॥ १० ॥ Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
English Meaning:
Or, it should be contemplated that injury (himsā), etc., are nothing but suffering. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
हिंसादि से विरक्त होने की भावना
flowchart TB
A["हिंसादि से विरक्त होने की भावना"]
A --> B["हिंसादि पाँच पाप"]
B --> C1["दुख रूप ही हैं<br/>(आकुलता रूप होने से)"]
B --> C2["से"]
C2 --> D1["इह (इस लोक)"]
C2 --> D2["अमुत्र (पर लोक)"]
D1 --> E["में"]
D2 --> E
E --> F1["अपाय (नाश)<br/>(स्वर्ग और मोक्ष का)"]
E --> F2["अवद्य (निन्दनीयता)"]
F1 --> G["देखा जाता है।"]
F2 --> GQuestions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer स्त्री के कोमल एवं सुन्दर शरीर के स्पर्श में सुख की कल्पना करना निरी मूर्खता है क्यों उससे सिर्फ वेदना का प्रतिकार होता है । जैसे- त्वचा, मांस, रुधिर और कलुष भावों से उद्गीर्ण खुजली से बाध्यमान (दु:खी) मानव खुजली मिटाने के लिए नख, मुख, पत्थर आदि के टुकड़ों के द्वारा खुजाता हुआ छिन्नगात्र हो जाता है, लहू-लुहान होता है उस खुजाने के दुःख को भी थोड़ी देर के लिए खाज बन्द हो जाने के कारण सुख मानता है, उसी प्रकार मैथुनसेवी मोह के कारण दुःख को भी सुख मानता है। (तथा ब्रह्मचारी अथवा सदाचारी को ब्रह्मचर्य का अनुपम सुख उत्पन्न होता है क्योंकि “तत् सुखं यत्र नासुखं” दुःख का जहाँ लेश मात्र भी नहीं है वहीं सुख है परन्तु कुशीलसेवी जीव को अनेक भय सताते हैं अत: दुःखपना युक्ति से सिद्ध है )
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
Answer जिस प्रकार अन्न को प्राण का कारण होने से अन्न में प्राण का उपचार किया जाता है उसी प्रकार दुःख के कारणभूत हिंसादि पाप दुःख रूप हैं ऐसा उपचार किया जाता है । अथवा धन में प्राण की तरह कारण के कारण में कार्य का उपचार किया जाता है। जैसे- धन से अन्न आता है और अन्न से प्राणों की स्थिति होती है अतः कारण के कारण में कार्य का उपचार करके धन को प्राण कहते हैं । कहा भी है- ‘धन मनुष्य का बाह्य प्राण है’ जो किसी का धन हरता है वह उसके प्राणों को ही हर लेता है, उसी प्रकार हिंसादि पाप असातावेदनीय कर्म के कारण हैं और असातावेदनीय कर्म दुःख का कारण है अतः दुःख के कारण के कारण रूप हिंसादि भी दुःख रूप ही हैं, ऐसा उपचार किया जाता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 4-Mar-2026
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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