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Acharya Shri Umaswati
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अदत्तादानं स्तेयम् ॥१५॥
सूत्रार्थ– बिना दी हुई वस्तु को ग्रहण करना चोरी है ॥१५॥


भावार्थ

अर्थ : बिना दी हुई वस्तु का लेना चोरी है। यहाँ भी ‘प्रमत्त योगात्’ इत्यादि सूत्र से ‘प्रमत्तयोग’ पद की अनुवृत्ति होती है। अतः बुरे भाव से जो पराई वस्तु को उठा लेने में प्रवृत्ति की जाती है वह चोरी है। उस प्रवृत्ति के बाद चाहे कुछ हाथ लगे या न लगे, हर हालत में उसे चोरी ही कहा जाएगा ।।१५।।Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

Taking anything that is not given is stealing (steya).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: सामान्य रूप से सबके लिए दिया गया नदी का जल, झरने और बावड़ी आदि का जल, सूखे गोबर के टुकड़े, भस्म आदि, स्वयं छोड़े गये मयूर पंख, तुम्बी फल आदि को मुनिराज कभी बिना दिये ग्रहण करते हैं तो भी उनके चोरी का दोष नहीं लगता है क्योंकि उनके प्रमत्त योग का अभाव है। जिस उपधि के ग्रहण – विसर्जन में, सेवन करने में सेवन करने वाले के छेद नहीं होता उस उपधि युक्त काल, क्षेत्र को जानकर इसलोक में श्रमण भली प्रकार से वर्तन करे। भले ही अल्प तथापि जो अनिन्दित हो, असंयतजनों से अप्रार्थनीय हो और जो मूर्च्छादि उत्पन्न नहीं करती हो ऐसी ही उपधि को श्रमण ग्रहण करे। यथाजात रूप लिंग जिनमार्ग में उपकरण कहा गया है, गुरु के वचन, सूत्रों का अध्ययन और विनय भी उपकरण कहे गये हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : आदान का अर्थ ग्रहण करना है और अदत्त वस्तु का आदान अदत्तादान है, उसे चोरी कहते हैं। अन्याय से दूसरे का धन ले लेना चोरी कहलाती है। आदान का अर्थ ग्रहण करना है। बिना दी हुई वस्तु का लेना अदत्तादान है और यही स्तेय – चोरी कहलाता है। परद्रव्य के अपहरण का अभिप्राय होना चोरी है। सर्व साधारण के उपयोग में आने वाले जल और तृण आदि पदार्थों को छोड़कर काम और क्रोधादि कषायवश दूसरों के धन को बिना दिये हुए ग्रहण करना चोरी है। प्रमाद के योग से दूसरे के बिना दिये गये धन-धान्यादि परिग्रह का ग्रहण करना चोरी है और वही वध के हेतु होने से हिंसा है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 4-Mar-2026

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