
Acharya Shri Umaswati
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Sutra
हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्य-दर्शनम्॥९॥
Meaning
हिंसादि पांच पापों के होने पर (इह) इस लोक में तथा (अमुत्र) परलोक में (अपायावद्यदर्शनम्) सांसारिक और पारमार्थिक- प्रयोजनों का बिगाड़ तथा निन्दा की प्राप्ति (जायते) होती है॥९॥


भावार्थ
हिंसादि पाप करने से इस लोक तथा परलोक में अनेक आपत्तियाँ प्राप्त होती हैं और निन्दा भी होती है। इसलिये इनको छोड़ना ही अच्छा है। Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
English Meaning:
It is worthwhile to contemplate that injury (himsā), etc., lead to calamity (apāya) and reproach ( avadya) in this world and in the next. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer अब्रह्म से विरक्त होने के लिए विचार करना चाहिए कि अब्रह्मचारी मानव जिस प्रकार मदोन्मत्त हाथी-हथिनी से ठगाया हुआ हथिनी के पीछे घूमता हुआ विवश होकर वध, बन्धन आदि क्लेशों का अनुभव करता है उसी प्रकार परस्त्री के वश हुआ मानव वध – बन्धनादि को भोगता है जो मोहाभिभूत होने के कारण कार्य-अकार्य के विचार से शून्य होकर किसी शुभ कर्म का आचरण नहीं करता, परस्त्री का आलिङ्गन तथा उसके संग में रति करता है, उसके सर्व लोग बैरी बन जाते हैं । परस्त्रीगामी इस लोक में लिङ्ग-छेदन, वध, बन्धन, क्लेश, सर्वस्वहरण आदि के दुःखों को प्राप्त होता है तथा मरकर अशुभगति में जाता है और निन्दनीय होता है अतः अब्रह्म से विरक्त होना ही श्रेयस्कर है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
Answer परिग्रह पाप से विरक्त होने के लिए विचार करना चाहिए कि परिग्रहवान पुरुष मांस के खण्ड को ग्रहण किये हुए पक्षी के समान अन्य पक्षियों के द्वारा झपटा जाता है, चोर आदि के द्वारा अभिभवनीय (तिरस्कृत) होता है, इस परिग्रह के अर्जन, रक्षण और विनाशकृत अनेक दुःखों को प्राप्त होता है, जैसे-ईंधन से अग्नि तृप्त नहीं होती है, उसी प्रकार परिग्रह से तृप्ति नहीं होती है, लोभ कषाय से अभिभूत होने से कार्य-अकार्य से अनभिज्ञ हो जाता है, परिग्रहवान मानव मरकर परलोक में नरक, तिर्यञ्चादि अशुभगति में जाता है, ‘यह कजूस है’ इत्यादि रूप से निन्दनीय होता है अतः परिग्रह का त्याग ही श्रेयस्कर है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
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Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 4-Mar-2026
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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