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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रिय-विषय-राग-द्वेष- वर्जनानि पञ्च ॥ ८ ॥
Meaning
पांचों इन्द्रियों के इष्ट विषयों में राग नहीं करना और अनिष्ट विषयों में द्वेष नहीं करना। ये पांच परिग्रहत्याग व्रत की भावनाएँ हैं॥ ८ ॥

भावार्थ

 पाँचों इन्द्रियों के इष्ट विषयों से राग नहीं करना और अनिष्ट विषयों से द्वेष नहीं करना ये पाँच परिग्रह त्याग व्रत की भावनाएँ हैं ॥ ८ ॥ Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Giving up attachment (rāga) and aversion (dveṣa) for agreeable (manojña) and disagreeable (amanojña) objects of the five senses constitutes five observances (bhāvanā) for the vow of non-attachment (aparigraha or akimcanya). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


परिग्रह त्याग व्रत की भावनाएँ
flowchart TB
    A["परिग्रह त्याग व्रत की भावनाएँ"]

    A --> B1["मनोज्ञ<br/>(जो मन को अच्छे लगें)"]
    A --> B2["अमनोज्ञ<br/>(जो मन को अच्छे न लगें)"]

    B1 --> C["ऐसे"]
    B2 --> C

    C --> D["पंचेन्द्रिय विषय-भोगों में"]

    D --> E["राग-द्वेष का त्याग"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer सर्वथा एकान्तवादियों के यहाँ यह भाव्य-भावक भाव सम्भव नहीं है, आत्मा को सर्वथा नित्य मानने वालों के यहाँ आत्मा भावक नहीं हो सकता है क्योंकि जिनके यहाँ आत्मा को कूटस्थ नित्य माना गया है उनके यहाँ जो पहले अभावक (नहीं भाने वाला) आत्मा है वह दूसरे समय में भावना करने वाला नहीं बन सकता है। अथवा -वर्तमान अवस्था में भावना कर रहे भावक आत्मा में सर्वदा पहले (पीछे) भावक बने रहने की आपत्ति आयेगी, जिससे सदा भावक ही बना रहना पड़ेगा। फलप्राप्ति की अवस्था आ जाने से प्रकृति का भीभावकपना सिद्ध नहीं हो सकता। इसी प्रकार क्षणिकपने का एकान्त पक्ष होने से पदार्थ एक समय से ऊपर अवस्थित ही नहीं है अत: यहाँ भी भाव्य-भावक भाव सम्भव नहीं हो सकता है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer आत्मा की कर्म रहित अवस्था रूप मोक्ष यहाँ पर भाव्य (भाने के योग्य) है। भव्य जीव इन भावनाओं का भावक (भाने वाला) है और भावना उस मोक्ष के उपायभूत सम्यग्दर्शनादि स्वभाव विशेष रूप सत्यभावना प्रसिद्ध है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 4-Mar-2026

Courtesy:
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