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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
मैत्री प्रमोद – कारुण्य- माध्यस्थ्यानि च सत्त्वगुणाधिक- क्लिश्य मानाविनयेषु ॥ ११॥
Meaning
(च) और (सत्त्वगुणाधिकक्लिश्यमानाबिनयेषु) सत्त्व, गुणाधिक, क्लिश्यमान और अविनय जीवों में क्रम से (मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि) मैत्री, हर्ष, करुणा और माध्यस्थ्य भावना भाना चाहिये। इनके भाने से अहिंसाव्रत अटल होता है॥ ११॥

भावार्थ

संसार के समस्त जीवों पर मैत्रीभाव, अधिक गुणवाले जीवों पर प्रमोदभाव, क्लिश्यमान जीवों पर कारुण्यभाव और अविनयी जीवों पर माध्यस्थ्यभाव होना चाहिये। मैत्री- दूसरों को दुःख न हो ऐसे अभिप्राय को मैत्री भावना कहते हैं। प्रमोद अधिक गुण वालों को देखकर प्रसन्नता आदि से प्रकट होने वाली अन्तरङ्ग की भक्ति को प्रमोद कहते हैं। कारुण्य – दुःखी जीवों के प्रति उपकार करने के भाव को कारुण्यभाव कहते हैं। माध्यस्थ्य जो जीव तत्त्वार्थश्रद्धान से रहित हैं तथा हित का उपदेश देने से उलटे-चिढ़ते हैं उनमें रागद्वेष का अभाव होने को माध्यस्थ्यभाव कहते हैं। Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book

English Meaning:

Benevolence (maitrī) towards all living-beings (sattva), joy (pramoda) at the sight of the virtuous (guṇādhika), compassion and sympathy (karunya) for the afflicted (kliśyamāna), and tolerance (mādhyasthya) towards the insolent and ill-behaved (avineya) are the other observances. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


व्रती के चिन्तन योग्य अन्य भावनाएँ
flowchart TB

A["व्रती के चिन्तन योग्य अन्य भावनाएँ"]

A --> B["मैत्री<br/>(दूसरे को दुख न हो)"]
A --> C["प्रमोद<br/>(प्रसन्नता के साथ भक्ति अनुराग)"]
A --> D["कारुण्य<br/>(दया)"]
A --> E["माध्यस्थ्य<br/>(राग-द्वेष पूर्वक पक्षपात न करना)"]

B --> B1["सत्त्व<br/>(चार गति के सर्व जीव)"]
C --> C1["गुणी जन<br/>(सम्यग्दर्शनादि गुणों में अधिक जीव)"]
D --> D1["दीन दुखी"]
E --> E1["अविनयी<br/>(जिनवाणी सुनने का गुण नहीं होने वाले हठाग्रही)"]





Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र आदि गुणाधिक के प्रति वन्दना, स्तुति, वैयावृत्त्य आदि करके प्रमोद भावना करनी चाहिए । Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer  जो जीव दीनता, शोक, भय, रोग आदि की पीड़ा से दुःखित हों; वध, बन्धन से रोके हुए हों, अथवा अपने जीवन की वाञ्छा से ‘हमको बचाओ’ ऐसी दीन प्रार्थना करने वाले हों तथा क्षुधा, तृषा, खेद आदि से पीड़ित हों, शीत-उष्णता आदि से पीड़ित हों, निर्दय पुरुषों की निर्दयता से रोके हुए मरण दुःख को प्राप्त हों, इस प्रकार दुःखी जीवों को देखने, सुनने से उनके दुःख दूर करने के उपाय की बुद्धि हो उसे करुणा नामकी भावना कहते हैं । शारीरिक, आगन्तुक मानसिक और स्वाभाविक ऐसी असह्य दु:खराशि प्राणियों को सता रही है, यह देखकर ‘अहह ! इन दीन प्राणियों ने मिथ्यादर्शन, अविरति, कषाय और अशुभयोग से जो कर्म उत्पन्न किया था, वह कर्म उदय में आकर इन जीवों को दुःख दे रहा है। ये कर्मवश होकर दुःख भोग रहे हैं। उनके दुःख से दुःखित होना करुणा है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 4-Mar-2026

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