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Acharya Shri Umaswati
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योगवक्रताविसंवादन चाशुभस्य नामः ॥२२॥
सुत्रार्थ- योगवक्रता और विसंवाद – ये अशुभ नाम कर्म के आश्रव हैं ॥२२॥




भावार्थ

अर्थ: मन, वचन और काय की कुटीलता से तथा किसी को धर्म के मार्ग से छुड़ाकर अधर्म के मार्ग में लगाने से अशुभ नाम कर्म का आश्रव होता है। ॥२२॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

Crooked-activity (yogavakratā) and deception (visamvādana) cause the influx of inauspicious (aśubha) physique-making (nāma) karmas.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: अन्य जीवों को संक्लेश उत्पत्ति का कारण होने से तथा अपने में संक्लेश होने से योगवक्रता और विसंवाद अशुभ नाम कर्म के आश्रव का कारण हैं क्योंकि संक्लेश परिणामों से पापकर्मों का आश्रव होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर: यद्यपि योगवक्रता और विसंवादन समान हैं फिर भी उनमें अन्तर है क्योंकि योगवक्रता आत्मगत है तथा विसंवादन आत्मान्तर का प्रयोजक होने से पर से सम्बन्ध रखता है इसलिए पृथक निर्देश किया है। जैसे कोई पुरुष सम्यक अभ्युदय और मोक्ष की कारणभूत क्रियायों में प्रवृत्ती कर रहा है, उसे मन, वचन, काय के द्वारा विसंवाद करता है कि तुम ऐसा मत करो, ऐसा करो इत्यादि रूप से प्रवृत्ति कराना विसंवादन है। अतः योगवक्रता आत्मगत है और विसंवादन परगत है, यह दोनों में अन्तर है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 03 March 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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