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सामायिकच्छेदोपस्थापना– परिहारविशुद्धि-सूक्ष्मसाम्पराय- यथाख्यातमिति चारित्रम् ॥१८॥
सूत्रार्थ– सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात – यह पाँच प्रकार का चारित्र है ।।१८।।
भावार्थ
अर्थ : सामायिक छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्म साम्पराय और यथाख्यात, इस तरह पाँच प्रकार का चारित्र है। समस्त सावद्ययोग का एक रूप से त्याग करना सामायिक चारित्र है। सामायिक चारित्र से डिगने पर प्रायश्चित के द्वारा सावद्य व्यापार में लगे हुए दोषों को छेद कर पुनः संयम धारण करना छेदोपस्थापना चारित्र है अथवा समस्त सावद्य योग का भेद रूप से त्याग करना छेदोपस्थापना चारित्र है। अर्थात मैंने समस्त पाप कार्यों का त्याग किया, यह सामायिक चारित्र का रूप है और मैंने हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का त्याग किया, यह छेदोपस्थापनाचारित्र का रूप है। जिस चारित्र में प्राणी हिंसा की पूर्ण निवृत्ति होने से विशिष्ट विशुद्धि पाई जाती है उसे परिहार विशुद्धि कहते हैं। जिसने अपने जन्म से तीस वर्ष की अवस्था तक सुखपूर्वक जीवन बिताया हो, और फिर जिन दीक्षा लेकर आठ वर्ष तक तीर्थंङ्कर के निकट प्रत्याख्यान नाम के नौवें पूर्व को पढ़ा हो और तीनों संध्या कालों को छोड़कर दो कोस विहार करने का जिसके नियम हो, उस दुर्द्धरचर्या के पालक महामुनि को ही परिहार विशुद्धि चारित्र होता है। इस चारित्र वाले के शरीर से जीवों का घात नहीं होता। इसी से इसका नाम परिहार विशुद्धि है। अत्यंत सूक्ष्म कषाय के होने से सूक्ष्म साम्पराय नाम के दसवें गुणस्थान में जो चारित्र होता है उसे सूक्ष्म साम्परायचारित्र कहते हैं। समस्त मोहनीय कर्म के उपशम से अथवा क्षय से जैसा आत्मा का निर्विकार स्वभाव है वैसा ही स्वभाव हो जाना यथाख्यात चारित्र है। इस चारित्र को अथाख्यात भी कहते हैं। क्योंकि अथ शब्द का अर्थ अनन्तर है और यह समस्त मोहनीय के क्षय अथवा उपशम होने के अंतर ही होता है। तथा इसे यथाख्यात भी कहते हैं, क्योंकि जैसा आत्मा का स्वभाव है वैसा ही चारित्र का स्वरूप है। सूत्र में जो यथाख्यात के बाद इति शब्द है वह यह बतलाता है कि यथाख्यात चारित्र से सकल कर्मों के क्षय की पूर्ति हो जाती है ॥ १८ ॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf
English Meaning:
Equanimity – samayika, reinitiation – chedopasthapana, purity of non-injury – pariharaviśuddhi, slight passion – sukṣmasamparāya, and perfect-conduct – yathakhyata, are the five kinds of conduct (caritra).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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चारित्र
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A["चारित्र"] --> B["व्रतों का धारण"] & C["समितियों का पालन"] & D["कषायों का निग्रह"] & E["दण्डों का त्याग"] & F["इन्द्रियों की विजय"]
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style E fill:#FFF9C4,stroke:#F9A825,color:#000000
style F fill:#FFEBEE,stroke:#C62828,color:#000000| नाम | सामायिक | छेदोप-स्थापना | परिहार विशुद्धि | सूक्ष्म साम्पराय | यथाख्यात |
|---|---|---|---|---|---|
| स्वरूप | समस्त सावद्य (हिंसा सहित) योग का एक साथ त्याग | • दोषों को दूर कर पुनः व्रतों का ग्रहण करना • समस्त सावद्य योग का भेद रूप से त्याग | प्राणी हिंसा से पूर्ण निवृत्ति से प्राप्त विशुद्धि | जहाँ कषाय अति सूक्ष्म हो | मोहनीय के सम्पूर्ण क्षय अथवा उपशम से आत्मा का जैसा स्वभाव है वैसा होना |
| गुण-स्थान | 6-9 | 6-9 | 6–7 | 10 | 11-14 |
सामायिकों में अन्तर
| सामायिक | गुणस्थान | स्वरूप |
|---|---|---|
| 1. सामायिक शिक्षा व्रत | दूसरी प्रतिमा, पंचम गुणस्थान | अभ्यास रूप |
| 2. सामायिक प्रतिमा | तीसरी प्रतिमा, पंचम गुणस्थान | व्रतरूप |
| 3. सामायिक आवश्यक | छठा-सातवाँ गुणस्थान | नियमरूप |
| 4. सामायिक चारित्र | छठे से नौवाँ गुणस्थान | यमरूप |
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Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: वीतराग चारित्र के परम्परा साधक सराग चारित्र को कहते है, जो अशुभ कार्य से निवृत्त होना और शुभकार्य में प्रवृत्त होना है, उसको चारित्र जानना चाहिए व्यवहारनय से उसको व्रत, समिति गुप्ति स्वरूप कहा है। वीतराग चारित्र में असमर्थ पुरुष शुद्धात्म भावना के सहकारीभूत जो कुछ प्रासुक आहार तथा ज्ञानादि के उपकरणों का ग्रहण करता है वह अपवाद मार्ग सराग चारित्र है जो अशुभ प्रवृत्तियों से तो राग नहीं करता किन्तु जिसे व्रतादिरूप शुभ प्रवृत्तियों में राग रहता है उसे यहाँ सराग चारित्र का धारक भ्रमण कहा है। श्रमणों के मूल गुण तथा उत्तर गुणों का धारण करना, उनका कथन करना, पाँच प्रकार का आचार, आठ शुद्धि तथा सुनिष्ठा ये सब सराग चारित्र है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
उत्तर : शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के योगों से निवृत्ति वीतराग साधुका चारित्र है। स्वरूप में विश्रान्ति सो ही परमवीतराग चारित्र है उस शुद्धात्मा में रागादि विकल्प रूप उपाधि से रहित स्वाभाविक सुख के आस्वादन से निश्चल चित्त होना वीतराग चारित्र है जिसे शुभ-अशुभ दोनों ही प्रकार का राग नहीं है वह श्रमण वीतराग है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Diksha Jain created this page on – 14th May 2026
Courtesy:
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