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Acharya Shri Umaswati
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आलोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपश्छेद-परिहारोपस्थापनाः ॥२२॥
सूत्रार्थ– आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार और उपस्थापना – यह नव प्रकार का प्रायश्चित है।।२२।।


भावार्थ

अर्थ : आलोचन, प्रतिक्रमण, तदुभय यानी आलोचन और प्रतिक्रमण दोनों, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार और उपस्थापना ये नौ भेद प्रायश्चित के हैं।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The nine subdivisions of expiation-prayascitta – are confession – alocana, repentance – pratikramana, combination of the first two-tadubhaya, discrimination – viveka, giving up attachment to the body – vyutsarga, penance – tapa, suspension-cheda, expulsion – parihara, and reinitiation – upasthapana.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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प्रायश्चित्त
प्रायश्चित्तस्वरूप
1. आलोचनागुरु के समक्ष अपने दोषों का निवेदन करना
2. प्रतिक्रमण‘मेरे दोष मिथ्या हों’ ऐसे भावों को वचनों से प्रकट करना
3. तदुभयआलोचना व प्रतिक्रमण दोनों साथ में करना
4. विवेकसदोष अन्न, पात्र, उपकरणादि मिलने पर उनका त्याग
5. व्युत्सर्गनियमित काल के लिए कायोत्सर्ग करना
6. तपअनशनादि
7. छेदकुछ समय की दीक्षा का छेद करना
8. परिहारकुछ समय के लिए संघ से दूर करना
9. उपस्थापनपूर्ण दीक्षा छेद कर पुनः दीक्षा प्राप्त करना

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: यह प्रायश्चित्त तप दोषों का निराकरण, शल्यों का अभाव, मर्यादा का पालन, संयम की स्थिरता और चित्त में अत्यन्त शान्ति की प्राप्ति होना आदि प्रमुख कार्यों की सिद्धि के लिए किया जाता है। प्रमाद से लगे दोषों का निराकरण, भावप्रसाद – परिणामों की निर्मलता, निःशल्यत्व-भावों की शल्य के निराकरण, अव्यवस्था के निस्तारण, मर्यादा के पालन, संयम की दृढ़ता, आराधना की सिद्धि आदि के लिए नव प्रकार का प्रायश्चित्त तप किया जाता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : जो मूर्ख अभिमानी मुनि अपने तपश्चरण को महा तपश्चरण समझकर व्रतादि के दोषों को शुद्ध करने के लिए प्रायश्चित्त नहीं करता उसके समस्त व्रतों तथा समस्त तपश्चरण को वे दोष शीघ्र नष्ट कर देते हैं तथा उन व्रत और तप के नाश के साथ-साथ उसके समस्त गुण नष्ट हो जाते हैं। जैसे कि सड़ा हुआ एक पान अन्य सब पानों को सड़ा देता है, उसी प्रकार एक ही दोष से सब व्रत, तप, गुण नष्ट हो जाते हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 10-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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