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Acharya Shri Umaswati
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हिंसाऽनृत-स्तेय-विषय संरक्षणेभ्यो रोद्रमविरत- देशविरतयोः
॥३५॥

सूत्रार्थ– हिंसा, असत्य, चोरी और विषय संरक्षण के लिए सतत चिन्तन करना रौद्रध्यान है। वह अविरत और देशविरत के होता है ।।३५।।


भावार्थ

अर्थ : हिंसा, झूठ, चोरी और परिग्रह संचय करने की चिन्ता करते रहने से रौद्रध्यान होता है। यह रौद्रध्यान पहले, दूसरे तीसरे और चौथे गुणस्थान वालों के तथा देश विरत श्रावकों के होता है। किन्तु संयमी मुनि के नहीं होता, क्योंकि यदि कदाचित मुनि को भी रौद्रध्यान हो जाए तो फिर वे संयम से भ्रष्ट समझे जाएँगे ॥३५॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

Cruel (raudra) meditation relates to injury – himsa, untruth – asatya, stealing – steya, and safeguarding of possessions – visayasamrakṣaṇa. It occurs in laymen without small vows – avirata, and laymen with partial vows-desavirata.
Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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आर्त – रौद्र ध्यान
नामआर्तध्यानरौद्र ध्यान
स्वरूपदुःख चिंतनपाप में आनंद
फलतिर्यंच गतिनरक गति
गुणस्थान1-6 (छठे में निदान नहीं)1-5
भेदनिरंतर चिंता करना• अनिष्ट संयोगज  • अप्रिय संयोग को दूर करने की• इष्ट वियोगज  • प्रिय के वियोग में उसकी प्राप्ति की• वेदना  • रोग दूर करने की• निदान  • आगामी भोगों की प्राप्ति कीआनंद मानना• हिंसानंदी  • हिंसा में• मृषानंदी  • झूठ में• चौर्यानंदी  • चोरी में• परिग्रहानंदी / विषयानंदी  • पाँच इन्द्रियों के भोगों में

निदान
निदान शल्यनिदान आर्तध्यान
* निरंतर सताती है* कभी-कभी होती है
* कषाय की तीव्रता* कषाय कम-तीव्र
* अविरती* अविरती व देशव्रती

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: जो लोभी वा चोर दूसरों की लक्ष्मी, स्त्री वा अच्छी वस्तुओं के हरण करने के लिए अपने चित्त में अशुभ संकल्प करते हैं अथवा कोई बहुत सा द्रव्य मार कर (चुराकर ) लाया हो उसकी अनुमोदना करते हैं उसके पाप उत्पन्न करने वाला चौर्यानन्द रौद्र्ध्यान होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : यदि मेरा द्रव्य कोई चुरायेगा तो मैं उसे मार डालूँगा, इस प्रकार से आयुध को हाथ में लेकर मारने का अभिप्राय करना परिग्रह संरक्षणानन्द रौद्रध्यान है। जगत् के अद्वितीय नाथ सर्वज्ञदेव ने मनुष्यों के आगे लिखे विचारों को विषयसंरक्षण के आनन्द से उत्पन्न हुआ रौद्रध्यान कहा है। जैसे- मनुष्य विचारे कि मैं तीक्ष्ण बाणों के समूहों से धनुष को आरोपण करके उद्धताशय वैरियों के समूह को छेदन पूर्वक उनके ग्राम श्रेष्ठ खानि आदि को दग्ध करके दूसरों के द्वारा साधने में न आवे ऐसे ऐश्वर्य व निष्कण्टक राज्य को प्राप्त होऊँगा तथा जो वैरी इस समय मेरी पृथ्वी, कन्या आदि रत्नों और सुन्दर स्त्री को लुब्धचित्त हुए छीन कर लेते हैं उनके कुल रूपी वन को मैं दग्ध करूंगा।अहो। देखो, जो समस्त भुवनों के जीवों से पूजनीय, सुभटों के समूह से सेवने योग्य, स्वजन धनादि से पूर्ण, रत्न और स्त्रियों से सुन्दर अमर्यादित विभव के सार ऐसे समस्त भोगों को अपने शत्रुओं के समूह का नाश करके मैंने पाया है। मैंने पृथ्वी को भेदकर, जीवों के समूह को मारकर, दुर्ग में प्रवेश करके समुद्र का उल्लंघन करके, बड़े गर्व से उद्धतशत्रुओं के मस्तक पर पाँव देकर उदार स्वामित्व व राज्य किया है। तथा जल-अग्नि- सर्प विषादि के प्रयोगों से विश्वास दिलाना, भेद करना, दूतभेद करना आदि प्रपंचों से शत्रुओं के समूह का नाश करके ‘यह मेरा प्रबल प्रताप है सो स्फुरायमान है’, ‘मैं ऐसा ही प्रतापी हूँ’ इत्यादि विचार करना चौथा रौद्रध्यान है। ‘ये पदार्थ, यह राज्य, यह सेना, यह स्त्री और यह सम्पत्ति सब मेरी है, जो दुरात्मा इसे हरण करेगा उसे मैं अपने पुरुषार्थ से मारूंगा, इस प्रकार दुर्बुद्धि लोग अपने पदार्थों की रक्षा करने के लिए अपने हृदय में संकल्प करते हैं, वह सब विषयसंरक्षणानन्द नाम का रौद्रध्यान है
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 11-Mar-2026

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