Table of Contents

Acharya Shri Umaswati
Read About Acharya Umaswami
here


आज्ञाऽपायविपाकसंस्थानविचयाय धर्म्यम् ॥३६॥
सूत्रार्थ– आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान इनकी विचारणा (विचय) के लिये मन को एकाग्र करना सो धर्मध्यान है ॥३६॥


भावार्थ

अर्थ : आज्ञा विचय, अपाय विचय, विपाक विचय और संस्थान विचय, ये धर्म ध्यान के चार भेद हैं। अच्छे उपदेष्टा के न होने से अपनी बुद्धि के मंद होने से और पदार्थ के सूक्ष्म होने से जब युक्ति और उदाहरण की गति न हो तो ऐसी अवस्था में सर्वज्ञ देव के द्वारा कहे गहे आगम को प्रमाण मानकर गहन पदार्थ का श्रद्धान कर लेना कि यह ऐसा ही है, आज्ञा विचय है । अथवा स्वयं तत्त्वों का जानकार होते हुए भी दूसरों को उन तत्त्वों को समझाने के लिए युक्ति दृष्टांत आदि का विचार करते रहना, जिससे दूसरों को ठीक ठीक समझाया जा सके, आज्ञा विचय है, क्योंकि उसका उद्देश्य संसार में जिनेंद्र देव की आज्ञा का प्रचार करना हैं। जो लोग मोक्ष के अभिलाषी होते हुए भी कुमार्ग में पड़े हुए हैं उनका विचार करना कि कैसे वे मिथ्यात्व से छूटें, इसे अपाय विचय कहते हैं। कर्म के फल का विचार करना विपाक विचय है। लोक के आकार का तथा उसकी दशा का विचार करना संस्थान विचय है। ये धर्म ध्यान अविरत, देश विरत, प्रमत्त संयत और अप्रमत्त संयत गुण स्थान वाले जीवों के ही होते हैं ॥३६॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The application of the mind on the reality as revealed by Lord Jina – ājñāvicaya, misfortune or calamity – apāyavicaya, fruition of karmas-vipākavicaya, and the structure of the universe – samsthānavicaya, are four kinds of virtuous ( dharmya) meditation.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Tilt phone to see complete table.


धर्म्य ध्यान
नामआज्ञाविचयअपायविचयविपाकविचयसंस्थानविचय
स्वरूपजिनेन्द्रदेव की आज्ञा प्रमाणजो प्राणी मिथ्यादर्शनादि से कैसे दूर हों, ऐसाकर्म के फल कालोक के आकार का
निरन्तर चिंतन करनानिरन्तर चिंतन करनानिरन्तर चिंतन करनानिरन्तर चिंतन करना
गुणस्थानयथायोग्य 4 से 7यथायोग्य 4 से 7यथायोग्य 4 से 7यथायोग्य 4 से 7

Video Pravachans
https://www.youtube.com/watch?v=KcV4JbABQkY&list=PLAITxWgNq5S_zsx0eUfodwu8pHlr–_0h&index=9

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: यह जीव उपयोगमय है, अमूर्त है, कर्म के सम्बन्ध से मूर्त्त है, गुणी है, समस्त पदार्थों में उत्कृष्ट है, शुभ-अशुभ कर्मों का भोक्ता है और उन कर्मों का नाश होने से उसी समय में मोक्ष में जा विराजमान होता है। यह जीव अत्यन्त सूक्ष्म है, असंख्यातप्रदेशी है और कर्मों के अधीन होकर इस जन्म- मरण रूप संसार में निरन्तर परिभ्रमण करता रहता है। इस प्रकार जीवों के स्वरूप का चिन्तन करना जीवविचय नाम का धर्मध्यान है।  द्रव्यार्थिक नय से जीव अनादि-निधन है और पर्यायार्थिक नय से सादि सनिधन है, असंख्यात प्रदेशी है, उपयोग लक्षण स्वरूप है, शरीर रूप अचेतन उपकरण से युक्त है, और अपने द्वारा किये गये कर्म के फल को भोगते हैं, इत्यादि रूप से जीव का जो ध्यान करना है वह जीव विचय नाम का तीसरा धर्मध्यान है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : योगी लोग धर्मध्यान की प्राप्ति के लिए अपने हृदय में जिनागम में कहे हुए धर्म-अधर्म- आकाश-काल और पुद्गल रूप अचेतन समस्त पदार्थों का स्वरूप उनके अनेक गुण-पर्यायों के द्वारा चिन्तन करते हैं अथवा उनके उत्पाद – व्यय – ध्रौव्य गुणों के द्वारा चिंतन करते हैं उसको अजीव विचय नाम का उत्कृष्ट धर्मध्यान कहते हैं।  धर्म-अधर्म आदि अजीव द्रव्यों के स्वभाव का चिन्तन करना सो अजीव – विचय नाम धर्मध्यान है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 11-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



All Chapters