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Acharya Shri Umaswati
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पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युपरत- क्रियानिवर्तीनि ॥३९॥
सूत्रार्थ– पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरत-क्रियानिवृत्ति – ये चार शुक्लध्यान हैं ।।३९।।


भावार्थ

अर्थ : पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रिया प्रतिपाति और व्युपरत क्रियानिवर्ति ये चार शुक्ल ध्यान के भेद हैं। ये सब नाम सार्थक हैं। इनका लक्षण आगे कहेंगे ।।३९।।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The four types of pure meditation – śukladhyāna – are known as: prthaktvavitarka, ekatvavitarka, sūksmakriyā- pratipāti, and vyuparatakriyānivarti, in order.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: जिसके शुक्ल लेश्या है, जो निसर्ग (स्वभाव) से बलशाली है, निसर्ग से शूर है, ऋषभ नाराच संहनन का धारी है, किसी एक संस्थान वाला है, चौदह पूर्वधारी है, दश पूर्वधारी है या नौ पूर्वधारी है, क्षायिक सम्यग्दृष्टि है और जिसने समस्त कषाय वर्ग का क्षय कर दिया है। (ऐसा क्षायिक सम्यग्दृष्टि ही समस्त कषायों का क्षय करता है।) उपशान्त कषाय गुणस्थान में एकत्ववितर्क – अवीचार ध्यान होता है। पहले कहे क्षीणकषाय के समय से बाकी बचे हुए समय में यह दूसरा शुक्लध्यान होता है। दूसरा शुक्ल ध्यान क्षीणकषाय गुणस्थान में सम्भव है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उपशान्त कषाय गुणस्थान में केवल पृथक्त्व वितर्कवीचार ध्यान ही होता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। और क्षीणकषाय गुणस्थान काल में सर्वत्र एकत्व वितर्क अवीचार ध्यान ही होता है, ऐसा भी कोई नियम नहीं है क्योंकि वहाँ योग परावृत्ति का कथन एक समय प्रमाण अन्यथा बन नहीं सकता। इससे क्षीणकषाय काल के प्रारम्भ में पृथक्त्व वितर्कवीचार ध्यान का अस्तित्व भी सिद्ध होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 11-Mar-2026

Courtesy:
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