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Acharya Shri Umaswati
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निदानं च ॥३३॥
सूत्रार्थ– निदान नाम का चौथा आर्तध्यान है।।३३।।


भावार्थ

अर्थ : भोगों की तृष्णा से पीड़ित होकर रात दिन आगामी भोगों को प्राप्त करने की ही चिन्ता करते रहना निदान आर्त ध्यान है। इस तरह आर्तध्यान के चार भेद हैं ॥३३॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The wish for enjoyment – nidana – is the fourth kind of sorrowful (arta) meditation.
Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: ये ध्यान अज्ञानमूलक, तीव्र पुरुषार्थजन्य, पापप्रयोगाधिष्ठान, परिभोगप्रसङ्ग, नाना संकल्पों से आकुलित, विषयतृष्णा से परिव्याप्त, धर्माश्रय के परित्यागी, कषायस्थानों से युक्त, अशान्तिवर्द्धक, प्रमाद के कारण, अप्रशस्त कर्म के हेतु, कटु फल देने वाले, असातावेदनीय के बन्धक और तिर्यञ्चगति में ले जाने वाले हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : अनिष्ट का संयोग, इष्ट का वियोग और वेदना के संयोग के कारण आर्त्तध्यान होता है, उसी प्रकार प्रीति विशेष के कारण से तीव्र कामादि वासना से आतुर मति वाले के, पौनर्भविक विषयसुख रस की गृद्धि वाले के, सांसारिक संस्कारों में तत्पर पुरुष के सांसारिक भोगों के तपश्चरण करने से होने वाले शरीर आदि के खेदपूर्वक निदान नाम का आर्त्त ध्यान होता है, उसे कहने के लिए यह सूत्र कहा गया है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 11-Mar-2026

Courtesy:
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