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Acharya Shri Umaswati
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बाह्याभ्यन्तरोपध्यो ।।२६।।
सूत्रार्थ– बाह्य और अभ्यन्तर उपधि का त्याग- यह दो प्रकार का व्युत्सर्ग है ।।२६।।


भावार्थ

अर्थ :  त्याग को व्युत्सर्ग कहते हैं। उसके दो भेद हैं। बाह्य उपधि त्याग और अभ्यन्तर उपधि त्याग। आत्मा से जुदे धन धान्य वगैरह का त्याग करना बाह्य उपधि त्याग है। और क्रोध मान माया आदि भावों का त्याग करना अभ्यन्तर उपधि त्याग है। कुछ समय के लिए अथवा जीवन भर के लिए शरीर से ममत्व का त्याग करना भी अभ्यन्तरोपधि त्याग ही कहा जाता है। इसके करने से मनुष्य निर्भय हो जाता है, वह हल्कापन अनुभव करता है तथा फिर जीवन की तृष्णा उसे नहीं सताती ॥२६॥Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The two subdivisions of renunciation – vyutsarga – are: giving up external (bāhya) and internal (abhyantara) appendages (upadhi).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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व्युत्सर्ग
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    A["व्युत्सर्ग"] --> B["बाह्य<br>• आत्मा से भिन्न<br>मकान, पुत्रादि का त्याग"] & C["अभ्यन्तर<br>• क्रोधादिरूप आत्मभाव का त्याग<br>• शरीर के ममत्व का त्याग"]

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: जो बाह्य पदार्थ आत्मा के द्वारा उपात्त नहीं हैं वा जो बाह्य पदार्थ आत्मा के साथ एकत्व को प्राप्त नहीं हुए हैं, उन पदार्थों का त्याग करना उसे बाह्योपधि व्युत्सर्ग जानना चाहिए।   आत्मा से एकत्व को नहीं प्राप्त हुए ऐसे वास्तु, धन और धान्य आदि बाह्य उपधि हैं। इनका त्याग करना बाह्य उपधि त्याग है। जिसे आत्मा स्वयं ग्रहण नहीं करता और न जो आत्मा के साथ मिलकर एक रूप होता है ऐसे आहार आदि का त्याग करना बाह्योपधि व्युत्सर्ग है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : जो मुनि मोक्ष की इच्छा करने वाला है, निद्रा को जीतने वाला है, तत्त्व और शास्त्रों के जानने में चतुर है, जिसके मन, वचन, काय शुद्ध हैं, जो बल और वीर्य से सुशोभित है, जो महा तपस्वी है, हृष्ट-पुष्ट, पूर्ण शरीर को धारण करने वाला है, महा धीर वीर है, जितेन्द्रिय है, परीषह और उपसर्गों को जीतने वाला है, जिसकी आकृति निश्चल रहती है, जो महाव्रती है, परमात्मा को जानने वाला है और मोक्ष को सिद्ध करने वाला है तथा और भी ऐसे-ही-ऐसे गुणों की खानि है, ऐसा मुनि उत्तम कायोत्सर्ग करने वाला कहा जाता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 10-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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