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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् ॥२७॥
Meaning
उत्तम संहनन के धारक मनुष्य का अपने चित्त की वृत्ति को सब ओर से रोककर एक ही विषय में लगाना ध्यान है यह ध्यान अधिक से अधिक अन्तमुहूर्त तक ही होता है॥२७॥

भावार्थ

किसी एक विषय में चित्त को रोकना सो ध्यान है । वह उत्तम संहननधारी जीवों के ही होता है और एक पदार्थ का ध्यान अन्तर्मुहूर्त से अधिक समय तक नहीं होता ॥२७॥ Reference:Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji

English Meaning:

Concentration of thought on one particular object is meditation – dhyāna. In case of the person with superior (first three kinds of) physical sturdiness and strength – samhanana – it extends up to one muhūrta. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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ध्यान
ध्यान
ध्यान
(एक विषय में चित्त का रुकना)
✻ ध्याता ध्यान करने वाला – उत्तम संहनन सहित (शुक्ल के तीन संहनन)
✻ ध्येय जिसका ध्यान किया जाए – एक अग्र (प्रधान विषय)
✻ ध्यान ज्ञान में व्यग्रता का अभाव
✻ ध्यान का काल अंतर्मुहूर्त

अंतर्मुहूर्त

flowchart TB

A["अंतर्मुहूर्त"]

A --> B["जघन्य<br> 1 आवलि 1 समय"]
A --> C["उत्कृष्ट<br> 48 मिनट में 1 समय कम"]



B --> D["इनके बीच में असंख्यात मध्यम भेद हैं"]
C --> D




Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer स्पष्टता के लिए ‘एकार्थचिन्तानिरोध:’ पद कहने पर अनिष्ट का प्रसंग आता है। इसी अध्याय के चवालीसवें ‘वीचारोर्थ व्यंजनयोगसंक्रान्ति : ‘ सूत्र में द्रव्य से पर्याय और पर्याय से द्रव्य में संक्रम का विधान किया गया है। अतः यदि एकार्थ-निरोध कहेंगे तो इस सूत्र के साथ विरोध आयेगा। क्योंकि ध्यान में अर्थसंक्रमण स्वीकार किया है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer एकाग्र पद देने में अनिष्ट का प्रसंग नहीं आता क्योंकि अग्र का अर्थ मुख होता है, अत: ध्यान अनेकमुखी न होकर एकमुखी रहता है और एकमुख में संक्रमण स्वीकार किया गया है। आभिमुख्य होने पर पुन:पुन: प्रवृत्ति को बताने के लिए एकाग्र पद दिया गया है, अत: इससे अनिष्ट का प्रसंग नहीं आता है। अथवा- यहाँ प्राधान्यवाची एक शब्द का ग्रहण है। अग्र शब्द प्राधान्यवाची है । इस पक्ष में यह अर्थ गृहीत है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 11-Mar-2026

Courtesy:
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