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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्षग्लानगणकुलसंघसाधुमनोज्ञानाम्
॥२४ ॥
Meaning
आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शैक्ष, ग्लान, गण, कुल, संघ, साधु और
मनोज्ञ – इनकी वैयावृत्त्य के भेद से वैयावृत्त्य दश प्रकार का है॥ २४ ॥

भावार्थ

आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शैक्ष, ग्लान, गण, कुल, संघ, साधु और मनोज्ञ इन दस प्रकार के साधुओं की अपेक्षा से वैयावृत्त्य के दस भेद हैं। जिनके पास जाकर सब मुनि व्रताचरण करते हैं उन्हें आचार्य कहते हैं। जिनके पास जाकर मुनिगण शास्त्राभ्यास करते हैं उन्हें उपाध्याय कहते हैं । जो साधु बहुत व्रत उपवास आदि करते हैं उन्हें तपस्वी कहते हैं। जो साधु श्रुत का अभ्यास करते हैं उन्हें शैक्ष कहते हैं । रोगी साधुओं को ग्लान कहते हैं । वृद्ध मुनियों की परिपाटी में जो मुनि होते हैं उन्हें गण कहते हैं। दीक्षा देने वाले आचार्य की शिष्य परंपरा को कुल कहते हैं। ऋषि, यति और अनगार के भेद से चार प्रकार के साधुओं के समूह को संघ कहते हैं । अथवा मुनि, आर्यिका और श्रावक श्राविका के समूह को संघ कहते हैं। बहुत समय के दीक्षित मुनि को साधु कहते हैं। जिसका उपदेश लोकमान्य हो अथवा जो लोक में पूज्य हो उस साधु को मनोज्ञ कहते हैं । इनको कोई व्याधि हो जाए या कोई उपसर्ग आ जाए या किसी का श्रद्धान विचलित होने लगे तो उसका प्रतिकार करना, यानी रोग का इलाज करना, संकट को दूर करना, उपदेश आदि के द्वारा श्रद्धान को दृढ़ करना वैयावृत्त्य है ॥ २४ ॥Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The ten subdivisions of respectful service – vaiyāvṛttya – are: respectful service to the head – ācārya, the preceptor – upadhyaya, the ascetic – tapasvī, the disciple – saikṣa, the ailing ascetic-glāna, the congregation of aged saints -gana, the congregation of disciples of a common teacher – kula, the congregation of the four orders of ascetics – samgha, the long-standing ascetic – sadhu, and the saint of high reputation – manojña. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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वैयावृत्य के विषय
flowchart TB

A["वैयावृत्य के विषय"]
B["(इन 10 प्रकार के मुनियों की सेवा)"]

A --> B

B --> C["आचार्य"]
B --> D["उपाध्याय"]
B --> E["तपस्वी"]
B --> F["शैक्ष"]
B --> G["ग्लान"]

C --> C1["व्रतों का आचरण करायें"]
D --> D1["श्रुत का अध्ययन करें-करायें"]
E --> E1["महान उपवासादि करें"]
F --> F1["शिक्षा शील"]
G --> G1["रोगी मुनि"]

B --> H["गण"]
B --> I["कुल"]
B --> J["संघ"]
B --> K["साधु"]
B --> L["मनोज्ञ"]

H --> H1["वृद्ध मुनियों का समुदाय"]
I --> I1["दीक्षाकाचार्य का शिष्य समुदाय"]
J --> J1["4 वर्ण के मुनियों का समूह"]
K --> K1["बहुत काल के दीक्षित"]
L --> L1["लोक सम्मत साधु"]
flowchart TB

A["4 प्रकार का संघ"]

A --> B["ऋषि"]
A --> C["मुनि"]
A --> D["यति"]
A --> E["अनगार"]

B --> B1["ऋद्धि प्राप्त"]
C --> C1["अवधिज्ञानी<br>मनःपर्ययज्ञानी"]
D --> D1["उपशम व<br>क्षपक श्रेणी वाले"]
E --> E1["शेष सभी मुनि"]

B1 --> F


F[" "]

F --> G["राजर्षि"]
F --> H["ब्रह्मर्षि"]
F --> I["देवर्षि"]
F --> J["परमर्षि"]

G --> G1[" विक्रिया<br> अक्षीण<br>महानस"]
H --> H1[" बुद्धि<br> सर्वोवधि<br>आदि"]
I --> I1["चारण"]
J --> J1["केवलज्ञान"]

L["प्राप्त<br>ऋद्धियों<br>के नाम"]

L --- G1
G1 --- H1
H1 --- I1
I1 --- J1

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer  मुनियों के दीक्षा गुरु और उपदेश दाता स्वयं आचरण शील होते हुए अन्य मुनियों को आचार पालन कराने वाले मुनि आचार्य हैं। ये कमल के समान निर्लिप्त, तेजस्वी, शान्तिप्रदाता, निश्चल गम्भीर और नि:संग होते हैं । ( प. पु. ) जिन सम्यग्दर्शन – ज्ञान आदि गुणों के आधारभूत महापुरुष से भव्यजीव स्वर्ग-मोक्ष रूप अमृत के बीजभूत व्रतों को ग्रहण कर अपने हित के लिए आचरण करते हैं, व्रतों का पालन करते हैं वा जो दीक्षा देते हैं वे आचार्य कहलाते हैं ।  जो आचार्य के छत्तीस गुण एवं पंचाचारों का पालन करते हैं उनको आचार्य कहते हैं । जिनसे आचरण ग्रहण किया जाता है उन्हें आचार्य कहते हैं, शासितुं योग्य शिष्यः इस व्युत्पत्ति अनुसार जो अनुशासन के योग्य हैं वे शिष्य कहलाते हैं। उनके अनुग्रह में (उनको ग्रहण करने में) कुशल होते हैं, दीक्षा आदि के द्वारा पर के ऊपर और स्वयं पर अनुग्रह करने वाले हैं वे आचार्य हैं। पंचाचारों से परिपूर्ण, पंचेन्द्रिय रूपी हाथी के मद का दलन करने वाले धीर और गुणगम्भीर ऐसे आचार्य होते हैं। प्रवचन रूपी समुद्र के जल के मध्य में स्नान करने से जिनकी बुद्धि निर्मल हो गयी है जो निर्दोष रीति से छह आवश्यकों का पालन करते हैं, जो मेरु के समान निष्कम्प हैं, जो शूरवीर हैं, जो सिंह के समान निर्भीक हैं, जो वर्य (श्रेष्ठ) हैं, देश, कुल और जाति से शुद्ध हैं, सौम्य मूर्त्ति हैं, अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग परिग्रह से रहित हैं, आकाश के समान निर्लेप हैं ऐसे आचार्य परमेष्ठी होते हैं ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer  आचारत्व आदि आठ गुण, दस प्रकार का स्थितिकल्प, बारह तप, छह आवश्यक ये छत्तीस गुण जानना चाहिए।  आठ ज्ञानाचार, आठ दर्शनाचार, बारह तप, पाँच समिति और तीन गुप्ति ये छत्तीस गुण होते हैं  ऐसे अन्य प्रकार से भी बारह तप ( अनशनादि), दस धर्म (उत्तमक्षमादि), छह आवश्यक (समतादि), तीन गुप्ति (मनो गुप्ति आदि) और पाँच आचार (ज्ञानाचारादि)। इस प्रकार छत्तीस गुण है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 10-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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