Table of Contents

Acharya Shri Umaswati
Read About Acharya Umaswami
here


स्त्रीरागकथाश्रवण-तन्मनोहराङ्गनिरीक्षण- पूर्वरतानुस्मरण-
वृष्येष्टरस- स्वशरीरसंस्कारत्यागाः पंच ॥७॥

सूत्रार्थ– स्त्रियों के विषय में राग उत्पन्न करने वाली कथा को न सुनना, स्त्रियों के मनोहर अंगों को न ताकना, पहले भोगे हुए भोगों का स्मरण न करना, कामोद्दीपन करने वाले रसों का सेवन न करना और अपने शरीर को इत्र तेल वगैरह से न सजाना, ये पाँच ब्रह्मचर्य व्रत की भावनाएँ हैं ॥७॥


भावार्थ

अर्थ : स्त्रियों के विषय में राग उत्पन्न करने वाली कथा को न सुनना, स्त्रियों के मनोहर अंगों को न ताकना, पहले भोगे हुए भोगों का स्मरण न करना, कामोद्दीपन करने वाले रसों का सेवन न करना और अपने शरीर को इत्र तेल वगैरह से न सजाना, ये पाँच ब्रह्मचर्य व्रत की भावनाएँ हैं ।।७।।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

Renunciation (tyaga) of these – listening to stories that incite attachment for women, looking at the beautiful forms of women, recalling former sexual pleasures, delicious food that stimulates amorous desire, and adornment of the body – constitutes the five observances (bhavana) for the vow of chastity (brahmacarya).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Tilt phone to see complete table.


ब्रह्मचर्य व्रत की भावनाएँ
---
config:
  theme: base
  themeVariables:
    background: '#ffffff'
    primaryColor: '#ffffff'
    primaryBorderColor: '#000000'
    lineColor: '#000000'
    textColor: '#000000'
---
flowchart LR
    A["ब्रह्मचर्य व्रत की भावनाएँ"] --> B["त्याग"]
    B --> C["स्त्री राग कथा श्रवण<br>(श्रवण इन्द्रिय)"] & D["मनोहर अंग निरीक्षण<br>(चक्षु इन्द्रिय)"] & E["पूर्व भोगे हुए विषयों का स्मरण<br>(मन)"] & F["गरिष्ठ रसों का सेवन<br>(रसना इन्द्रिय)"] & G["शरीर का संस्कार<br>(स्पर्श और घ्राण इन्द्रिय)"]

    style A fill:#FF6D00
    style B fill:#d9e8fb,stroke:#FFD600
    style C fill:#d9e8fb,stroke:#2962FF
    style D fill:#f8d7da,stroke:#FFCDD2
    style E fill:#BBDEFB,stroke:#2962FF
    style F fill:#E1BEE7,stroke:#AA00FF
    style G fill:#FFE0B2,stroke:#FFD600

Video Pravachans

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: साधु घी तेल आदि से शरीर का अभ्यंजन भी नहीं करते। क्योंकि घी आदि से तथा क्षार से भूमि आदि तथा शरीर आदि में चिपटे जीवों को बाधा पहुँचती है। उद्वर्तन अर्थात् उबटन लगाने से शरीर से चिपटे त्रस जीव यहाँ वहाँ गिरकर मर जाते हैं तथा उबटन तैयार करने के लिए वृक्ष की जड़, छाल, फल, पत्ते आदि को पीसने या दलने में महान् असंयम होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : स्त्रीरागकथा को जो त्याग है वह ब्रह्मचर्य व्रत की पहली भावना है। यह सुख देने वाले कर्म-सातावेदनीय आदि शुभ कर्मों का बन्ध करने वाली है। स्त्रियों के सर्व अवयव दृष्टिमार्ग में आने मात्र से ही साधुओं के ब्रह्मचर्यव्रत का नाम भी रहने नहीं देते तो अन्य लोगों का ब्रह्मचर्य स्त्रियों के अवयव देखने से कैसे टिक सकता है? कदापि नहीं। मेघवृष्टि से ताड़ित बैल अपना मस्तक नीचे करके जैसे जाते हैं वैसे उपांगों का रूप देख कर मस्तक नम्र कर अर्थात् स्त्रियों के सुन्दर अवयवों से अपनी दृष्टि हटा कर सज्जन जाते हैं। स्त्रियों का हँसना, उनकी क्रीड़ा, उनके पूर्व संभोग का स्मरण और उनके आलिंगन का स्मरण ब्रह्मचारी नहीं करते हैं। जो काम पीड़ा की तीव्रता का कारण है, ऐसा सरस और उन्मत्त बनाने वाला आहार ब्रह्मचर्य धारण करने वाले मुनिजन लेते ही नहीं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 3-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



All Chapters