
Acharya Shri Umaswati
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शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्षशुद्धिसधर्माविसंवादाःपञ्च ।।६।।
सूत्रार्थ– शून्यागारवास, विमोचितावास, परोपरोधाकरण, भैक्षशुद्धि और सधर्माविसंवाद- ये अचौर्य व्रत की पाँच भावनाएँ हैं ||६||
भावार्थ
अर्थ : शून्यागार अर्थात् पर्वत की गुफा, वन और वृक्षों के कोटरों में निवास करना, विमोचितावास अर्थात् दूसरों के छोड़े हुए उजाड़ स्थान में निवास करना, परोपरोधाकरण अर्थात् जहाँ आप ठहरे वहाँ यदि कोई दूसरा ठहरना चाहे तो उसे रोकना नहीं और जहाँ कोई पहले से ठहरा हो तो उसे हटाकर स्वयं ठहरे नहीं, भैक्ष्य शुद्धि अर्थात् शास्त्रोक्त रीति से शुद्ध भिक्षा लेना और साधर्मी विसंवाद अर्थात् साधर्मी भाइयों से वाद-विवाद नहीं करना ये पाँच अचौर्य व्रत की भावनाएँ हैं ।।६।।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf
English Meaning:
Residence in a solitary place – śunyagaravasa, residence in a deserted habitation – vimocitavāsa, causing no hindrance to others – paroparodhakaraṇa, acceptance of clean food – bhaikṣyaśuddhi, and not bickering with the fellow monks – sadharma visamvada, are the five observances (bhavana) for the vow of non-stealing (acaurya).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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अचौर्य व्रत की भावनाएँ
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A["अचौर्य व्रत की भावनाएँ"] --> B["आवास संबंधित"] & C["भैक्ष्य शुद्धि<br>(भिक्षा की शुद्धि रखना)"] & D["सधर्म विसंवाद<br>(साधर्मी के साथ<br>विसंवाद नहीं करना)"]
B --> E["शून्यागार वास<br>(निर्जन स्थान में रहना)"] & F["विमोचितावास<br>(दूसरों के द्वारा छोड़े<br>स्थान में निवास करना)"] & G["परोपरोधाकरण<br>(दूसरों के अपने ठहरे हुए<br>स्थान पर आने से नहीं रोकना)"]
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Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: शून्यागार, विमोचितावास, परोपरोधाकरण, भैक्ष्यशुद्धि और सधर्माविसंवाद, ये पाँच अचौर्यव्रत की भावनाएँ हैं । ( रा. वा. ) व्यसनी मनुष्य तथा दुष्ट मनुष्य तीव्र कषायी कलह का करने वाला पुरुषनिकरि शून्य मकान होय तहाँ बसने का भाव राखै। जातैं तीव्रकषायी दुष्टनि कै नजीक बसने में परिणामकी शुद्धता नष्ट हो जाय, दुर्ध्यान प्रकट हो जाय तातैं पापीन करि शून्य मकान में बसना सो ही शून्यागार भावना है ॥ १ ॥ बहुरि जिस मकान में अन्य दूजा का झगड़ा नाहीं होय तहाँ निराकुल वसना सो विमोचितावास है ॥२॥ बहुरि अन्य के मकान में आप जवरीतैं नाहीं धँस बैठना सो परोपरोधाकरण भावना है ॥ ३ ॥ बहुरि अन्याय अभक्ष्यकूं त्यागि भोगान्तराय का क्षयोपशम के अधीन मिल्या जो रसनीरस भोजन तामें समता धारि लालसारहित भोजन करना सो भैक्ष्यशुद्धि भावना है॥४॥ साधर्मी पुरुषमें वादविसंवाद नाहीं करना सो सधर्माविसंवादभावना है। (१) परिमित आहार लेना (२) तपश्चरण योग्य आहार लेना (३) श्रावक के प्रार्थना करने पर आहार ग्रहण करना (४) योग्य विधि के विरुद्ध आहार नहीं लेना ( ५ ) प्राप्त हुए भोजन में संतोष रखना। (१) देहधनं यानी शरीर मात्र को धन मानता है (२) शरीर में अशुचित्व की भावना करता है (३) शरीर में अनित्यत्व आदि भावना करता है (४) परिग्रह में अवग्रह अर्थात् निवृत्ति की भावना भाता है (५) भोजन पान आदि आहार में गृद्धता से रहित होता है। (पा.प्र.) (१) याचना ( २ ) समनुज्ञापना (३) अपनत्व का अभाव (४) त्यक्त प्रतिसेवना (५) साधर्मी के उपकरणों का अनुकूल सेवन (१) असम्मत का अग्रहण (२) सम्मत में अनासक्त बुद्धि (३) दीयमान योग्य वस्तु में अपने लिए उपकारी का ही ग्रहण (४) अननुज्ञात में अप्रवेश (जो ज्ञात नहीं है, उसमें प्रवेश नहीं करना) और योग्य वस्तु की याचना (१) आहार आदि ग्रहण करने में शुद्धि (२) कुटिल कार्यों के अनुमोदन का त्याग (३) जहाँ कोई आरम्भ – परिग्रह न होवे ऐसे शून्य स्थान पर निवास करना (४) उस स्थान पर रहना जिसे लोग छोड़ गये हों। (५) प्रत्येक अवस्था में सत्य धर्म के प्रति अक्षुण्ण अनुराग बनाये रखना। उपकरणों को उसके स्वामी की आज्ञा के बिना ग्रहण नहीं करना, स्वामी की अनुज्ञा से ग्रहण की गयी वस्तु में आसक्ति नहीं रखना, ‘आपको इतना देना चाहिए’ इस प्रकार प्रयोजन को बताते हुए वस्तु मांगना, अपनी इच्छा से दातार देगा तो उसे पूरी-पूरी ग्रहण करूंगा, ऐसी भावना नहीं रखना, ज्ञान एवं चारित्र की उपयोगी वस्तु ही ग्रहण करना, गृह स्वामी (मालिक) के मना करने पर उसके घर में प्रवेश नहीं करना, आगम के अविरुद्ध ही संयमोपकरण की याचना करना, ‘यहाँ ठहरें’ इस प्रकार से जहाँ गृहस्वामी की अनुज्ञा प्राप्त न हो उस देश में प्रवेश नहीं करना।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
उत्तर : याचना प्रार्थना करना। समनुज्ञापना- किसी की कोई भी वस्तु उसकी अनुमति लेकर ग्रहण करना । अथवा कदाचित् बिना अनुमति के ले भी ली हो तो पुनः उनसे निवेदन कर देना । अनन्य भाव (अपनापन ) नहीं रखना । अदुष्ट भाव या अनात्म भाव रखना, दूसरे की गृहीत वस्तु में आत्मभाव त्यक्त प्रतिसेवना जो श्रमण के योग्य है और जिसका अन्य कोई इच्छुक नहीं है ऐसी सावद्यरहित निर्दोष वस्तु त्यक्त कहलाती है अथवा वियत्ति पाठ निकालकर ‘आचार्य’ अर्थ करना चाहिए। इस प्रकार श्रमण योग्य वस्तु का अथवा आचार्य का जो अनुकूलतया सेवन है वह त्यक्त प्रतिसेवना है अथवा निर्दोष वस्तु या आचार्य को उनके अनुकूल सेवन करने वाला आश्रय लेने वाला मुनि त्यक्त प्रतिसेवी है। यह प्रतिसेवी शब्द उपर्युक्त भावनाओं के साथ भी लगा लेना। जैसे-याचना पूर्वक उपकरण आदि वस्तु का प्रतिसेवन करना। अनुमति पूर्वक उनकी वस्तु का प्रतिसेवन-प्रयोग करना । अन्य के शास्त्र आदि को अपनेपन की भावना से रहित अनात्म भाव से सेवन या उपयोग करना तथा निर्दोष मुनि अवस्था के योग्य त्यक्त वस्तु का अथवा आचार्य का प्रतिसेवन करना ये चार भावनाएँ हुईं। साधर्मिकोपकरण अनुवीचिसेवन समान है धर्म अर्थात् अनुष्ठान जिनका वे सधर्मी या सहधर्मी मुनि कहलाते हैं। उनके पुस्तक, पिच्छिका आदि उपकरणों का अनुवीचि अर्थात् आगम के अनुसार सेवन करना।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
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- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
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- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
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Diksha Jain created this page on 3-Mar-2026
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