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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
वाचनापृच्छनानुप्रेक्षाऽम्नायधर्मोपदेशाः ॥ २५ ॥
Meaning
 वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश – ये स्वाध्याय के पाँच भेद हैं॥ २५ ॥

भावार्थ

वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश, ये पाँच स्वाध्याय के भेद हैं। धर्म के इच्छुक विनयशील पात्रों को शास्त्र देना, शास्त्र का अर्थ बतलाना तथा शास्त्र भी देना और उसका अर्थ भी बतलाना वाचना है। संशय को दूर करने के लिए अथवा निश्चय करने के लिए विशिष्ट ज्ञानियों से प्रश्न करना पृच्छना है। जाने हुए अर्थ का मन से अभ्यास कराना अर्थात उसका बार बार विचार करना अनुप्रेक्षा है। शुद्धतापूर्वक पाठ करना आम्नाय है। धर्म का उपदेश करना धर्मोपदेश है। इस तरह स्वाध्याय के पाँच भेद हैं। स्वाध्याय करने से ज्ञान बढ़ता है, वैराग्य बढ़ता है, तप बढ़ता है, व्रतों में अतिचार नहीं लगने पाता तथा स्वाध्याय से बढ़कर दूसरा कोई सरल उपाय मन को स्थिर करने का नहीं है। अतः स्वाध्याय करना हितकर है ।। २५ ।। Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The five subdivisions of study – svādhyāya – are: teaching – vācanā, questioning-prcchanā, reflection-anupreksā, recitation – āmnāya, and preaching-dharmopadeśa. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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स्वाध्याय
flowchart TB

A["स्वाध्याय"]

A --> B["वाचना"]
A --> C["पृच्छना"]
A --> D["अनुप्रेक्षा"]
A --> E["आम्नाय"]
A --> F["धर्मोपदेश"]

B --> B1["पढ़ना"]
C --> C1["पूछना"]
D --> D1["चिंतन"]
E --> E1["पुनः-पुनः दोहराना"]
F --> F1["उपदेश देना"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer  स्वाध्याय तप पाँच प्रकार का होता है- (१) पढ़े हुए ग्रन्थ का पाठ करना (२) वाचना (३) पृच्छना (४) अनुप्रेक्षा (५) धर्मकथा। २. (१) वाचना (२) पृच्छना (३) अनुप्रेक्षा (४) आम्नाय ( ५ ) धर्मोपदेश । वाचना शास्त्र का व्याख्यान करना वाचना है।  पृच्छना शास्त्र का श्रवण करना पृच्छना है।  अनुप्रेक्षा – अधिगत अर्थ का मन के द्वारा अभ्यास करना अनुप्रेक्षा है। आम्नाय – विशुद्ध घोष से पाठ का परिवर्तन करना आम्नाय है। -धर्मोपदेश – धर्मकथा आदि का अनुष्ठान करना धर्मोपदेश है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer यदि कोई पंचेन्द्रिय जीव पीड़ा से दुःखी हो रहा हो, मर रहा हो, अथवा त्रस-स्थावर जीवों का घात करने वाले कार्यों में से कोई कार्य हो रहा हो तो स्वाध्याय बन्द कर दिया जाता है। यदि बालक, चाण्डाल, जलप्रवाह, दीपक और अग्नि के स्फुलिंग अत्यन्त निकट आ जावें तथा दूर से दावानल का धुआँ और दुर्गन्ध आ रही हो तो वाचना नहीं होनी चाहिए।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 10-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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