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Acharya Shri Umaswati
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प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥२०॥
सूत्रार्थ – प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान – यह छह प्रकार का आभ्यन्तर तप है।।२०।।


भावार्थ

अर्थ : प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्त्य स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान ये छह अभ्यन्तर तप हैं। ये तप मन को वश में करने के लिए किए जाते हैं इसलिए इन्हें अभ्यन्तर तप कहते हैं। प्रमाद से लगे हुए दोषों को दूर करना प्रायश्चित तप है। पूज्य पुरुषों का आदर करना विनय तप है। शरीर वगैरह के द्वारा सेवा सुश्रुषा करने को वैयावृत्य कहते हैं। आलस्य त्याग कर ज्ञान का आराधन करना स्वाध्याय है। ममत्व के त्याग को व्युत्सर्ग कहते हैं और चित्त की चंचलता के दूर करने को ध्यान कहते हैं ॥२०॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

Expiation– prayascitta, reverence– vinaya, service– vaiyavrttya, study– svadhyaya, renunciation– vyutsarga, and meditation– dhyana, are the internal (abhyantara) austerities (tapa).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: जिस ध्यान से मुनियों के व्रतों में लगे दोष शुद्ध हो जायें उसको प्रायश्चित्त कहते हैं । जिसके द्वारा प्राचीन पाप नष्ट हो जावें वह प्रायश्चित्त कहलाता है । अथवा प्रायस् का अर्थ मनुष्य है और चित्त का अर्थ कर्म है चूंकि प्रायश्चित्त मनुष्य के कर्म हर लेता है नष्ट कर देता है, इसलिए उसे प्रायश्चित्त कहते हैं। अपराध को प्राप्त हुआ जीव जिस तप के द्वारा अपने पूर्व संचित पापों से विशुद्ध हो जाता है वह प्रायश्चित्त है। जिससे स्पष्टतया पूर्व के व्रतों से परिपूर्ण हो जाता है वह तप भी प्रायश्चित्त कहलाता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : वैयावृत्य रत्नत्रय की प्राप्ति के लिए मन-वचन-काय की शुद्धि पूर्वक की जाती है। क्लेश को नष्ट करने वाले प्रासुक निवास तथा अन्नपान आदि के द्वारा इनके (अन्नादि ) अभाव में अपने ‘प्रत्युपकार की अपेक्षा बिना अपने शरीर से की जाती है । विष्ठा, कफ, तथा नाक का मल आदि को उनके शरीर से दूर करना, यत्नपूर्वक सावधानी से उन्हें उठाना-बैठाना तथा करवट बदलाना आदि क्रियाओं से वैयावृत्य की जाती है। )वसति, स्थान, आसन तथा उपकरण इनके प्रतिलेखन द्वारा उपकार करना, आहार, औषध आदि से, मलादि दूर करने से और उनकी वन्दना आदि के द्वारा वैयावृत्य करना चाहिए।  जो मुनि कंकरीले और ऊँचे-नीचे मार्ग आदि में चलने से खेद खिन्न हैं उनके पाँव दबाना, सेवा शुश्रूषा करना, धर्मोपदेश देना, उनकी विष्ठा, मूत्र, कफ आदि हटाना, उनको अपने पास रखना, उनका अनुग्रह करना, उनकी रक्षा करना, आवश्यकतानुसार उनको उपकरण देना, उनके निर्वाह का प्रबन्ध करना आदि अनेक प्रकार से वैयावृत्य करना चाहिए।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 10-Mar-2026

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