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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासन-कायक्लेशाः बाह्यं तपः ॥ १९॥
Meaning
अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन
और कायक्लेश – यह छह प्रकार का बाह्य तप है॥ १९॥

भावार्थ

 अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्त शय्यासन, कायक्लेश ये छह बाह्य तप के भेद हैं। ख्याति, पूजा, मंत्र सिद्धि वगैरह लौकिक फल की अपेक्षा न करके, संयम की सिद्धि, राग का उच्छेद, कर्मों का विनाश, ध्यान तथा स्वाध्याय की सिद्धि के लिए भोजन का त्याग करना, अनशन तप है। संयम को जागृत रखने के लिए, विकारों की शांति के लिए, संतोष और स्वाध्याय आदि की सुखपूर्वक सिद्धि के लिए अल्प आहार करना अवमौदर्य तप है। जब मुनि भिक्षा के लिए निकलें तो घरों का नियम करना कि मैं आहार के लिए इतने घर जाऊँगा अथवा अमुक रीति आहार मिलेगा तो लूँगा, इसे वृत्तिपरिसंख्यान तप कहते हैं। यह तप भोजन की आशा को रोकने के लिए किया जाता है। इंद्रियों के दमन के लिए, निद्रा पर विजय पाने के लिए तथा सुखपूर्वक स्वाध्याय करने के लिए घी, दूध, दही, तेल, मीठा और नमक का यथायोग्य त्याग करना रस परित्याग तप है । ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय, ध्यान आदि की सिद्धि के लिए एकांत स्थान में शयन करना तथा आसन लगाना विविक्त शय्यासन तप है। कष्ट सहने के अभ्यास के लिए, आराम करने की भावना को दूर करने के लिए और धर्म की प्रभावना के लिए ग्रीष्म ऋतु में वृक्ष के नीचे ध्यान लगाना, शीत ऋतु में खुले हुए मैदान में सोना, अनेक प्रकार के आसन लगाना आदि कायक्लेश तप हैं। बाह्य द्रव्य खानपान आदि की अपेक्षा से ये तप किए जाते हैं तथा इन तपों का पता दूसरे लोगों को भी लग जाता है इसलिए इन्हें बाह्य तप कहते हैं।Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The six kinds of external (bahya) austerities (tapa) are fasting – anaśana, reduced diet – avamaudarya, special restrictions for begging food – vṛttiparisamkhyāna, giving up stimulating and delicious food – rasaparityāga, lonely habitation – viviktaśayyāsana, and mortification of the body – kāyakleśa. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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तप
flowchart TB

A[तप]

A --> B[निश्चय तप<br>शुद्धात्म स्वरूप में प्रतापन]
A --> C[व्यवहार तप]

C --> D[बाह्य तप]
C --> E[आभ्यंतर तप]

D --> D1["* बाह्य द्रव्य के अवलम्बन से होते हैं"]
D --> D2["* दूसरों को दिखते हैं"]
D --> D3["* बाह्य तप आभ्यंतर तप की पुष्टि के लिए हैं"]

E --> E1["* बाह्य द्रव्य की अपेक्षा नहीं रहती है"]
E --> E2["* मानसिक क्रिया की प्रधानता रहती है"]
E --> E3["* आभ्यंतर तप वीतरागता की वृद्धि के लिए हैं"]

बाह्य तप

बाह्य तप
नाम अनशन अवमौदर्य / ऊनोदर वृत्ति-परिसंख्यान रस परित्याग विविक्त शय्यासन कायक्लेश
स्व-रूप 4 प्रकार के आहार, विषय व कषाय का त्याग दिन में एक बार भूख से कम आहार करना अनेक प्रकार की अटपटी प्रतिज्ञाओं की पूर्ति पर भोजन करना 1, 2 आदि 6 रसों तक का त्याग करना एकांत स्थान में सोना-बैठना अनेक प्रकार के काय के कष्ट रूप तप करना
क्यों किया जाता है? – संयम की सिद्धि
– राग का नाश
– ध्यान, आगम की प्राप्ति के लिये
– संयम की जागृति
– संतोष एवं स्वाध्याय की सिद्धि के लिए
– आशा की निवृत्ति
– परम संतोष की सिद्धि के लिए
– इन्द्रियों पर विजय
– निद्रा पर विजय
– स्वाध्याय की सिद्धि के लिए
– ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय, ध्यान की प्रसिद्धि के लिए – सुख विषयक आसक्ति कम करने के लिये
– प्रवचन प्रभावना के लिए

4 प्रकार का आहार

flowchart TB

A["4 प्रकार का आहार"]

A --> B["खाद्य<br>रोटी आदि"]
A --> C["पेय<br>पानी आदि"]
A --> D["लेह्य<br>चटनी आदि"]
A --> E["स्वाद्य<br>सौंफ-इलायची आदि"]

6 प्रकार के रस

flowchart TB

A["6 प्रकार के रस"]

A --> B["घी"]
A --> C["दूध"]
A --> D["तेल"]
A --> E["खांड, गुड़ आदि"]
A --> F["नमक"]
A --> G["दही"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer जिस तपश्चरण से मनुष्यों के मन में अशुभ संक्लेश उत्पन्न न हो, जिससे तपश्चरण में श्रद्धा उत्पन्न होती रहे, अशुभ ध्यानों का नाश होता रहे, महायोग वा धर्म्य-शुक्ल ध्यान में किसी प्रकार की कमी न हो, श्रेष्ठ गुण बढते जायें और अभ्यन्तर तप भी जिससे बढ़ते जायें उसको बाह्य परम तपश्चरण कहते हैं। बाह्य तप वही है जिससे मन अशुभ को प्राप्त नहीं होता है, जिससे श्रद्धा उत्पन्न होती है तथा जिससे योग-मलगणहीन नहीं होते हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer अधिक भोजन करने वाला धर्म का अनुष्ठान नहीं कर सकता है, परिपूर्ण आवश्यक क्रियाओं का पालन नहीं कर पाता है। आतापन, अभ्रावकाश और वृक्षमूल इन तीन काल सम्बन्धी योगों को करने में भी समर्थ नहीं हो पाता है। उस मुनि की इन्द्रियाँ भी स्वेच्छाचारी हो जाती हैं। किन्तु मितभोजी साधु में धर्म, आवश्यक आदि क्रियाएँ स्वेच्छा से रहती हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 10-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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