
Acharya Shri Umaswati
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Sutra
मिथ्योपदेश – रहोभ्याख्यान – कूटलेखक्रिया-
न्यासापहार-साकार-मंत्रभेदाः ॥२६॥
Meaning
मिथ्योपदेश, रहोभ्याख्यान, कूट लेख क्रिया, न्यासापहार और साकार मंत्र भेद, ये पाँच सत्याणुव्रत के अतिचार हैं ॥२६॥


भावार्थ
झूठ और अहितकर उपदेश देना मिथ्योपदेश है। स्त्री और पुरुष के द्वारा एकांत में की गई क्रिया को प्रकट कर देना रहोभ्याख्यान है । किसी का दबाव पड़ने से ऐसी झूठी बात लिख देना, जिससे दूसरा फँस जाए सो कूटलेख क्रिया है । कोई आदमी अपने पास कुछ धरोहर रख जाए और भूल से कम माँगे तो उसको उसकी भूल न बताकर जितनी वह माँगे उतनी ही दे देना न्यासापहार है। चर्चा वार्ता से अथवा मुख की आकृति वगैरह से दूसरे के मन की बात को जानकर लोगों पर इसलिए प्रकट देना कि उसकी बदनामी हो, सो साकार मंत्र भेद है । ये सत्याणुव्रत के पाँच अतिचार हैं॥२६॥Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
English Meaning:
Perverted teaching – mithyopadeśa, divulging what is done in secret – rahobhyākhyāna, writing falsely – kūṭalekhakriyā, misappropriation – nyāsāpahāra, and proclaiming others’ thoughts – sākāramańtrabheda – are the five transgressions of the second minor vow of truthfulness (satyāṇuvrata).
Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
सत्याणुव्रत
| मिथ्योपदेश | रहोभ्याख्यान | कूटलेखक्रिया | न्यासापहार | साकारमंत्रभेद |
|---|---|---|---|---|
| मोक्षमार्ग से विपरीत उप- देश देना | स्त्री-पुर्ष के एकांत आच- रण को प्रकट कर देना | अन्य के बारे में झूठा लेख लिखना | धरोहर रखने वाला आकर कम वापस माँगे तो कम ही दे देना | किसी कारण दूसरे के मन की बात जान उसे अन्य को प्रकट कर देना |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer अभ्युदय (स्वर्ग) और निःश्रेयसार्थक (मोक्ष) क्रियाओं में अन्यथा प्रवृत्ति कर देना या उनके प्रति विपरीत बात कहना मिथ्योपदेश है ।परिवाद का अर्थ मिथ्योपदेश है । अभ्युदय और मोक्ष प्रयोजन वाले क्रियाविशेषों में दूसरे को अन्यथा प्रवृत्ति कराना परिवाद या मिथ्योपदेश है। अभ्युदय और मोक्ष की कारणभूत क्रियाओं में किसी दूसरे को विपरीत मार्ग में लगा देना या मिथ्यावचनों द्वारा दूसरों को ठगना मिथ्योपदेश है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
Answer सातावेदनीय आदि प्रशस्त कर्म – प्रकृतियों के तीव्र अनुभाग के उदय से उत्पन्न हुआ इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंश आदि देव संबंधी दिव्य सुख और चक्रवर्ती, बलदेव, नारायण, अर्धमण्डलीक, मण्डलीक, महामण्डलीक, राजा, अधिराज, महाराजाधिराज परमेश्वर आदि मनुष्य संबंधी मानुष्य सुख को अभ्युदय सुख कहते हैं। अरिहंत और सिद्धों के अतीन्द्रिय सुख को नैश्रेयस् सुख कहते हैं। तीर्थंकर और कल्पातीत (सिद्ध) इनके अतीन्द्रिय, अतिशयरूप, आत्मोत्पन्न, अनुपम और श्रेष्ठ सुख को नि:श्रेयस् सुख कहते हैं ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026
Courtesy:
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