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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
शंका- कांक्षा-विचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसा-
संस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतिचाराः ॥२३॥

Meaning
शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टि प्रशंसा, अन्य दृष्टि संस्तव, ये सम्यग्दर्शन के पाँच अतिचार हैं॥२३॥

भावार्थ

अरहंत भगवान के द्वारा कहे गए तत्त्वों में यह शंका होना कि ये ठीक हैं या नहीं, शंका है। अथवा अपनी आत्मा को अखंड अविनाशी जानकर भी मृत्यु वगैरह से डरना सो शंका है। इस लोक या परलोक में भोगों की चाह को कांक्षा कहते हैं। दुःखी, दरिद्री, रोगी, आदि को देखकर उससे घृणा करना विचिकित्सा है। मिथ्यादृष्टियों के ज्ञान, तप वगैरह की मन में सराहना करना अन्यदृष्टि प्रशंसा है और वचन से तारीफ करना संस्तव है। ये पाँच सम्यग्दर्शन के अतिचार यानी दोष हैं।Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Doubt in the teachings of Lord Jina – śańkā, desire for worldly enjoyment – kāńkṣā, repugnance or disgust at the afflicted – vicikitsā, admiration for the knowledge and conduct of the wrong-believer – anyadṛṣṭipraśamsā and praise of the wrong-believer – anyadṛṣṭisamstava, are the five transgressions of the right-believer (samyagdṛṣṭi). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


सम्यग्दर्शन के अतिचार
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A["सम्यग्दर्शन के अतिचार"]

A --> B["शंका <br><br>  आत्मा को अखण्ड अविनाशी जानकर भी <br> 7 प्रकार के भय को प्राप्त होना"]
A --> C["कांक्षा <br><br>  इस लोक परलोक में <br> भोगादिक सामग्री की <br> वांछा होना"]
A --> D["विचिकित्सा <br><br>  दु:खी, रोगी दरिद्री इत्यादि <br> मनुष्य, तिर्यंच और मुनिराज <br> के शरीर को देख ग्लानि <br> करना"]
A --> E["अन्यदृष्टि <br><br>  मिथ्यादृष्टि का ज्ञान, <br> चारित्र आदि को देख"]

E --> E1["प्रशंसा <br><br>  मन में भला जानना"]
E --> E2["संस्तव <br><br>  वचनों से प्रशंसा करना"]



सम्यग्दृष्टि को इन दोषों का खेद हो और ये यदा-कदा हों तो ये अतिचार हैं, अन्यथा अनाचार होते हैं।

व्रतमंग के लिए सहायक परिणाम

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A["व्रतमंग के लिए सहायक परिणाम"]

A --> B["अतिक्रम <br><br> * मन में व्रतभंग का विचार उठना"]

A --> C["व्यतिक्रम <br><br> * व्रत का उल्लंघन करना"]

A --> D["अतिचार <br><br> * विषयों में प्रवृत्ति"]

A --> E["अनाचार <br><br> * विषयों में अतिशय आसक्तिरूप प्रवृत्ति"]
अतिचार अनाचार
  • व्रत का एकदेश भंग
  • अज्ञान, असावधानी, मोहवश होते हैं
  • संस्कारवश – क्षणिक
  • आत्मग्लानि सहित हो जाने वाला
  • ‘यह गलत किया’ ऐसा भाव होता है
  • पर्वत जितना होने पर भी हल्का
  • व्रत का पूर्ण भंग
  • जान-बूझकर करना
  • अभिप्राय पूर्वक
  • अच्छा समझकर किया जाने वाला
  • ‘किया तो किया, क्या गलत है’ ऐसा भाव होता है
  • तुच्छ होने पर भी बड़ा अपराध

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer जैन तीर्थंकरों द्वारा कहा गया यह उग्र तप सत्यता का मन्दिर न होने से प्रशंसनीय नहीं है एवं यह तप रूपी वस्तु सदोष है इस प्रकार के मानसिक अभिप्राय को विचिकित्सा (दोष) कहते हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer यहाँ (भी) नियत विषय में जुगुप्सा को अतिचार रूप से माना है। रत्नत्रय में, रत्नत्रय में से किसी एक में अथवा रत्नत्रय के धारी में कोप आदि के निमित्त से होने वाली जुगुप्सा का यहाँ ग्रहण है। अत: उसका दर्शन या ज्ञान या चारित्र अच्छा नहीं है। जिसकी जहाँ यह श्रद्धा होती है कि यह श्रेष्ठ नहीं है वह उसकी जुगुप्सा करता है अतः रत्नत्रय के माहात्म्य में अरुचि होना अतिचार है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026

Courtesy:
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