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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीता-
गमनानङ्गक्रीड़ाकामतीव्राभिनिवेशाः।।२८।।

Meaning
पर विवाह करण, अपरिग्रहीत इत्वरिका गमन, परिगृहीत इत्वरिका गमन, अनंग क्रीड़ा और काम तीव्राभिनिवेश, ये पाँच ब्रह्मचर्याणुव्रत के अतिचार हैं।।२८।।

भावार्थ

कन्या के वरण करने को विवाह कहते हैं। दूसरों का विवाह कराना पर विवाह करण है। व्यभिचारिणी स्त्री को इत्वरिका कहते हैं। वह दो प्रकार की होती है- एक जिसका कोई स्वामी नहीं है और दूसरी जिसका कोई स्वामी है। इन दोनों प्रकार की व्याभिचारिणी स्त्रियों के यहाँ जाना आना, उनसे बातचीत, लेन-देन वगैरह करना अपरिग्रहीत और परिग्रहीत इत्वरिका गमन है। काम सेवन के अंगों को छोड़कर अन्य अंगों से रति करना अनंग क्रीड़ा है। काम सेवन की अत्यधिक लालसा को काम तीव्राभिनिवेश कहते हैं। ये पाँच अतिचार ब्रह्मचर्याणुव्रत के हैं। Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Bringing about others’ marriage – paravivahakaraṇa, intercourse with an unchaste married woman – itvarikā parigṛhītāgamana, cohabitation with a harlot – itvarikā aparigṛhītāgamana, perverted sexual practice – anangakrīḍā, and excessive sexual-desire – kāmatīvrābhi- niveśa – are the five transgressions of the fourth minor vow of contentment with one’s wife (svadārasantoṣa aṇuvrata). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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ब्रह्मचर्याणुव्रत
flowchart TB

T["ब्रह्मचर्याणुव्रत"]

%% 4 columns in one row (table look)
subgraph ROW[" "]
direction LR

%% Column 1
subgraph C1[" "]
direction TB
C1H["परिविवाह<br>करण"]
C1B["दूसरों का<br>विवाह<br>कराना"]
C1H --> C1B
end

%% Column 2 (Itvarika with 2 sub-boxes + common text)
subgraph C2[" "]
direction TB
C2H["इत्वरिका"]

subgraph C2TOP[" "]
direction LR
C2A["परिगृहीता<br>गमन<br><br>जिसका कोई<br>स्वामी हो"]
C2B["अपरिगृहीता<br>गमन<br><br>जिसका कोई<br>स्वामी न हो"]
end

C2M["ऐसी व्यभिचारिणी स्त्री के<br>यहाँ जाना-आना आदि करना"]

C2H --> C2A
C2H --> C2B
C2A --> C2M
C2B --> C2M
end

%% Column 3
subgraph C3[" "]
direction TB
C3H["अनंगक्रीडा"]
C3B["काम सेवन के<br>निश्चित अंगों<br>को छोड़ शेष<br>अंगों द्वारा काम<br>सेवन करना"]
C3H --> C3B
end

%% Column 4
subgraph C4[" "]
direction TB
C4H["काम तीव्र-<br>भिनिवेश"]
C4B["काम सेवन<br>की तीव्र<br>अभिलाषा<br>रखना"]
C4H --> C4B
end

end

%% Connect title to each column header (like the top bracket)
T --> C1H
T --> C2H
T --> C3H
T --> C4H

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer जिसका स्वभाव अन्य पुरुषों के पास आना-जाना है वह इत्वरी कहलाती है। इत्वरी अर्थात् अभिसारिका। इसमें भी जो अत्यन्त कुत्सिता होती है वह इत्वरिका कहलाती है। यहाँ कुत्सित अर्थ में ‘क’ प्रत्यय होकर इत्वरिका शब्द बना है । जिसका कोई एक पुरुष भर्त्ता है वह परिगृहीता कहलाती है । (सर्वा. ७१४) अयन शील को इत्वरी कहते हैं । ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम से प्राप्त गाननृत्यादि कला और चारित्रमोह नामक स्त्रीवेद के उदय से विशिष्ट अंगोपांग के लाभ से जो पर-पुरुषों को प्राप्त होती है, पर-पुरुषों का सेवन करती है, उनको अपने आधीन करती है, वह इत्वरी कहलाती है और कुत्सित अर्थ में ‘क’ प्रत्यय करने से इत्वरिका शब्द की निष्पत्ति होती है। जो एक पुरुष के द्वारा परिणीत है, वह फिर भी परपुरुषरमणशील है वह परिगृहीता इत्वरिका है, इसके साथ सम्बन्ध रखना परिगृहीताइत्वरिका गमन है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer  जिसका कोई पुरुष स्वामी नहीं है, जो वेश्या या व्यभिचारिणी होने से दूसरे पुरुषों के पास आती-जाती रहती है ऐसी अपरिगृहीता इत्वरिका का गमन करना अपरिगृहीता इत्वरिका गमन है। (सर्वा. ७१४) जो वेश्या रूप से वा पुंश्चली रूप से पर-पुरुषों को सेवन करती है, जिसका कोई स्वामी नहीं है वह अपरिगृहीता इत्वरिका है। इससे सम्बन्ध रखना, उसके यहाँ आना-जाना अपरिगृहीता-इत्वरिका गमन है। स्वेच्छाचारिणी और अगृहीत कुलटा स्त्रियों के पास जाना अगृहीतेत्वरिका गमन है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026

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