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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
निः शल्यो व्रती ॥ १८ ॥
Meaning
जो शल्य रहित हो उसे व्रती कहते हैं ॥ १८ ॥

भावार्थ

शरीर में घुसकर तकलीफ देने वाले कील काँटे आदि को शल्य कहते हैं। जैसे कील काँटा कष्ट देता है वैसे ही कर्म के उदय से होने वाला विचार भी जीव को कष्टदायक है इसलिए उसे शल्य नाम दिया है। वह शल्य तीन है- माया, मिथ्यात्व और निदान। मायाचार या धूर्तता को माया कहते हैं। मिथ्या तत्त्वों का श्रद्धान करना कुदेवों को पूजना मिथ्यात्व है । और विषय भोग की चाह को निदान कहते हैं। जो इन तीनों शल्यों को हृदय से निकाल कर व्रतों का पालन करता है वही व्रती है। किंतु जो दुनिया को ठगने के लिए व्रत लेता है या व्रत लेकर यह सोचता रहता है कि व्रत धारण करने से मुझे भोगने के लिए अच्छी-अच्छी देवांगनाएँ मिलेंगी, या जो व्रत लेकर भी मिथ्यात्व में पड़ा है वह कभी भी व्रती नहीं हो सकता ॥ १८ ॥ Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The votary (vratī) is free from stings (śalya). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


व्रती की विशेषता
flowchart TB

A["व्रती की विशेषता"]

B["शल्य (निरंतर पीड़ा देने वाली वस्तु, जैसे शरीर में चुभा काँटा) से रहित होना"]

A --> B



B --> D["मिथ्यात्व<br/>✱ अतत्वों का<br/>श्रद्धान करना"]

B --> E["माया<br/>✱ ठगने की<br/>वृत्ति होना"]

B --> F["निदान<br/>✱ भोगों की<br/>लालसा होना"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer जो शल्य रहित होकर पाँच अणुव्रत, रात्रिभोजनत्याग और सातों शीलों को अतिचार रहित पालता है वह व्रती कहलाता है। जो तीन शल्यों से रहित है वही निःशल्य व्रती कहा जाता है। देश, अनूप, जांगल और साधारण ऐसी देश की अवस्थाओं का; हिमकाल, वर्षाकाल, उष्णकाल और अपनी शक्ति और वात, पित्त, कफादि रूप प्रकृति इन बातों का जो विचार करता है ऐसा निर्मल बुद्धि वाला पुरुष जीव दया में तत्पर होकर जिनमत के अनुसार माया, मिथ्यात्व और निदान इन तीन शल्यों से रहित होता हुआ निरतिचार अहिंसादि व्रत धारण करता है, वही व्रती होता है। ज्ञान और सम्यग्दर्शन से जिनका चित्त निर्मल हुआ है, उनका यह व्रतपंचक निर्मल होता है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer शरीर में चुभे हुए काँटे के समान विविध प्रकार की वेदना रूपी शलाकाओं (सुइयों) के द्वारा जो प्राणियों को छेदती हैं, दु:ख देती हैं वे शल्य हैं। जैसे- शरीर में चुभे हुए काँटा आदि प्राणियों को बाधा करने वाली शल्य है उसी प्रकार कर्मोदय विकार भी शारीरिक और मानसिक बाधा का कारण होने से, शल्य की भाँति शल्य नाम से उपचरित किये जाते हैं।  चतुर्गति रूप संसार में प्राणियों को शारीरिक, मानसिक, आगन्तुक दुःखों के द्वारा पीड़ा देती है वह शल्य है। शरीर में घुस जाने वाले बाण आदि शस्त्र के समान जीव के मन में चुभे, बाधा करे वह शल्य है अथवा शरीर और मन को बाधा उत्पन्न करने वाला होने से कर्म का विकार भी शल्य है। (सर्वा. ६९७) प्राणी को शृणाति पीड़ा देती है, वह शल्य है, तत्त्वज्ञों ने शल्य शब्द की ऐसी व्याख्या की है। जैसे – शरीर में घुसा हुआ बाणादि शल्य प्राणी को अधिक व्यथित करता है, वैसे ही माया, मिथ्यात्व, निदान ये तीन प्राणियों को संसारभ्रमण का दुःख देते हैं, इसलिए इनको शल्य कहना चाहिए। शारीरिक और मानसिक पीड़ा देने वाला कर्मों का उदय, क्षयोपशमादिक रूप जो मायादि के भेद से तीन शल्य हैं, जीवों को पीड़ा देता है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026

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