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Acharya Shri Umaswati
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अणुव्रतोऽगारी ॥२०॥
सूत्रार्थ – अणुव्रतों का धारी अगारी है।।२०।।


भावार्थ

अर्थ : जो पाँचों पापों का एक देश से त्याग करता है उस अणुव्रती को अगारी कहते हैं। अर्थात् त्रस जीवों की हिंसा करने का त्याग करना प्रथम अणुव्रत है। राग, द्वेष अथवा मोह के वशीभूत होकर ऐसा वचन न बोलना जिससे किसी का घर बर्बाद हो जाए या गाँव पर मुसीबत आ जाए, दूसरा अणुव्रत है। जिससे दूसरे को कष्ट पहुँचे अथवा जिसमें राजदंड का भय हो ऐसी बिना दी हुई वस्तु को न लेने का त्याग तीसरा अणुव्रत है। विवाहित या अविवाहित पर स्त्री के साथ भोग का त्याग चौथा अणुव्रत है। धन, धान्य, जमीन-जायदाद वगैरह का आवश्यकता के अनुसार एक प्रमाण निश्चित कर लेना पाँचवाँ अणुव्रत है। इन पॉच अणुव्रतों को जो नियमपूर्वक पालता है वही अगारी व्रती है ॥२०॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The one who observes minor-vows (anuvrata) is a householder – agari.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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व्रती
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    A["व्रती"] --> B["अगारी<br>• भाव घर सहित - गृहस्थ व्रती<br>→ अणुव्रती"] & C["अनगारी<br>• भाव घर रहित - गृह त्यागी साधु<br>→ महाव्रती"]

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गृहस्थ के व्रत
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flowchart TB
    A["गृहस्थ के व्रत"] --> B["5 अणुव्रत<br>• मूल व्रत<br>• अटल व्रत<br>(समस्त पाप क्रिया का<br>पूर्ण अभाव न होने से)"] & C["7 शील व्रत<br>• उत्तर व्रत<br>• मूल व्रतों की<br>रक्षा के लिए हैं"] & D["सल्लेखना<br>• जीवन के अंत में<br>स्वीकृत व्रत"]

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अनुव्रत
अहिंसाणुव्रतसत्याणुव्रतअचौर्य
अनुव्रत
ब्रह्मचर्याणुव्रतपरिग्रह परि-
माणाणुव्रत
संकल्पी त्रस हिंसा का त्याग व स्थावर हिंसा को यथासंभव कम करनास्नेह, बैर, मोह, भय के वश असत्य कहने का त्यागबिना दिया दूसरे के द्रव्य को ग्रहण करने का त्यागस्वीकारी या बिना स्वीकारी परस्त्री के संग का त्याग करनास्वेच्छा से परिग्रह का परिमाण करना

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: सर्व सावद्य योग की निवृत्ति असम्भव होने से ये अणुव्रत कहलाते हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : इस संसार में जो श्रावक निःशंकित आदि अंगों का पालन करते हैं, जैनधर्म का पालन कर प्रसन्न होते हैं, संतोष आदि सद्गुणों को धारण करने में तत्पर हैं, श्री जिनेन्द्रदेव और मुनियों के भक्त हैं, धर्मध्यान में लीन रहते हैं और जिनकी बुद्धि शुभ है ऐसे श्रावक पाँचों अणुव्रतों को पालन कर सुख देनेवाले अच्युत स्वर्ग को पाते हैं और फिर अनुक्रम से मोक्ष प्राप्त करते हैं। ये पाँचों अणुव्रत देवगति के सुख के घर हैं, ज्ञान रूपी रत्न के पिटारे हैं, मोक्ष की जड़ हैं, अनेक गुणों से सुशोभित हैं, दुर्गति रूपी घर को बन्द करने के लिए किवाड़ हैं तथा पापरूपी वृक्ष को जलाने के लिए अग्नि हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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