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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
मूर्छा परिग्रहः॥१७॥
Meaning
प्रमाद के योग से पदार्थों के रक्षण के भाव को परिग्रह कहते हैं॥१७॥

भावार्थ

बाह्य गाय, भैंस, मणि, मुक्ता वगैरह चेतन अचेतन वस्तुओं में तथा आंतरिक राग, द्वेष, काम, क्रोधादि विकारों में जो ममत्व भाव है, कि ये मेरे हैं, इस भाव का नाम मूर्छा है और मूर्छा ही परिग्रह है। वास्तव में अभ्यन्तर ममत्व भाव ही परिग्रह है क्योंकि पास में एक पैसा न होने पर भी जिसे दुनिया भर की तृष्णा है वह परिग्रही है। बाह्य वस्तुओं को तो इसलिए परिग्रह कहा है कि वे ममत्व भाव के होने में कारण होती हैं। Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Infatuation (mūrcchā) is attachment-to-possessions (parigraha). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


परिग्रह
flowchart TB
    A["परिग्रह"]

    A --> B["अभ्यंतर (14)<br/>(आत्मा का परिणाम)"]
    A --> C["बाहिरंग (10)<br/>(बाह्य पदार्थ)"]

    B --> B1["मिथ्यात्व"]
    B --> B2["4 कषाय"]
    B --> B3["9 नोकषाय"]

    C --> C1["क्षेत्र-मकान"]
    C --> C2["सोना-चाँदी"]
    C --> C3["धन-धान्य"]
    C --> C4["दास-दासी"]
    C --> C5["बर्तन-कपड़े"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer बाह्य और अभ्यन्तर पदार्थों में ‘यह मेरा है’ इस प्रकार के संकल्प को परिग्रह कहते हैं। मूर्च्छा को परिग्रह कहते हैं ।  रागादि तो कर्मों के उदय से होते हैं, अत: वे आत्मा का स्वभाव न होने से हेय हैं। इसलिए उनमें होने वाला संकल्प परिग्रह है । ‘यह मेरा है, मैं इसका स्वामी हूँ’ इस प्रकार का ममत्व परिणाम परिग्रह है। ‘परिगृह्यते इति परिग्रहः’ जो ग्रहण किया जाता है, इस निरुक्ति के अनुसार क्षेत्रादि रूप बाह्य पदार्थ परिग्रह कहा जाता है, वह परिग्रह “परिगृह्यते अनेनेति परिग्रह:’ इस निरुक्ति के अनुसार बाह्य पदार्थ के ग्रहण में कारणभूत परिणाम परिग्रह कहा जाता है । इच्छा परिग्रहः इच्छा ही परिग्रह है
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer  बाह्य-अभ्यन्तर उपधि के रक्षण आदि के व्यापार को मूर्च्छा कहते हैं। गाय, भैंस, मणि, मुक्ता आदि चेतन-अचेतन बाह्य परिग्रह के और राग-द्वेषादि अभ्यन्तर परिग्रह के संरक्षण, अर्जन, संस्कारादि लक्षण-व्यापार को मूर्च्छा कहते हैं । अन्तरंग परिग्रह के होने पर ही बहिरंग परिग्रह को मूर्च्छा कहा जाता है। वात-पित्त-कफ या अन्य शारीरिक दोष के प्रकोप से उत्पन्न होने वाली बेहोशी को मूर्च्छा नहीं कहना चाहिए क्योंकि यही विशिष्ट अर्थ गृहीत है। यद्यपि मूर्च्छा धातु मोह सामान्यार्थक है फिर भी यहाँ बाह्याभ्यन्तर परिग्रहों के संरक्षण विषय में ही उसका ग्रहण किया है, इस प्रकार विशिष्टता होने से इष्ट अर्थ का संप्रत्यय होता है तथा सामान्य अर्थ की प्रेरणा विशेष अर्थ में व्याप्त रहती ही है ।तोड़ने के लिए कठिन ऐसा कर्म जिससे प्राणी प्राप्त कर लेता है, उसे परिग्रह समझना चाहिए। इसी काही ‘मूर्च्छा’ यह नाम है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 4-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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