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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
मैथुनमब्रह्म ॥१६॥
Meaning
जो मैथुन है सो अब्रह्म अर्थात् कुशील है।

भावार्थ

चारित्र मोहनीय का उदय होने पर राग भाव से प्रेरित होकर स्त्री-पुरुष का जोड़ा जो रति सुख के लिए चेष्टा करता है उसे मैथुन कहते हैं । और मैथुन को ही अब्रह्म कहते हैं। कभी कभी दो पुरुषों में अथवा दो स्त्रियों में भी इस प्रकार की कुचेष्टा देखी जाती है। और कभी कभी अकेला एक पुरुष ही काम से पीड़ित होकर कुचेष्टा कर बैठता है। वह सब अब्रह्म है। जिसके पालन से अहिंसा आदि धर्मों की वृद्धि होती है उसे ब्रह्म कहते हैं। और ब्रह्म का नहीं होना अब्रह्म है। यह अब्रह्म सब पापों का पोषक है क्योंकि मैथुन करने वाला हिंसा करता है, उसके लिए झूठ बोलता है, चोरी करता है और विवाह करके गृहस्थी बसाता है ॥ १६ ॥ Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Copulation (maithuna) is unchastity (abrahma). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


अब्रह्म
flowchart TB

A["अब्रह्म"]

A --> B["बाहिरंग<br/>(रतिजन्य सुख के लिए<br/>पुरुष-स्त्री की जो भी चेष्टा)"]

A --> C["अंतरंग<br/>(ब्रह्म [आत्मा] में<br/>लीनता का अभाव)"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer चारित्रमोहनीय कर्म का उदय होने पर स्त्री और पुरुष के परस्पर शरीर का सम्मिलन होने से सुख-प्राप्ति की इच्छा से होने वाला जो राग परिणाम है वह मैथुन कहलाता है। ‘ब्रह्मि वृद्धौ’ धातु से ब्रह्म शब्द बना है, जिसका परिपालन करने से अहिंसादि गुणों की वृद्धि होती है वह ब्रह्म कहलाता है, ब्रह्म नहीं है या ब्रह्म का अभाव है वह अब्रह्म कहलाता है, वह अब्रह्म ही मैथुन है। स्त्री और पुरुष के मन, वचन व काय स्वरूप विषय व्यापार को मैथुन कहा जाता है। यहाँ पर अन्तरंग मैथुन के समान बहिरंग मैथुन को भी ( कर्मबन्ध का ) कारण बतलाना चाहिए।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer मैथुन के दस दोष (कारण) हैं- वादित्र आदि सुनना (१) शरीर का संस्कार करना (२) पुष्ट रस का सेवन करना । (३) गीत, नृत्य, (४) स्त्री का संसर्ग करना। (५) स्त्री में किसी प्रकार के संकल्प का विचार करना। (६) स्त्री के अंग देखना। (७) स्त्री को देखने का संस्कार (स्मृतियाँ) रखना। (८) पूर्व में भोगे भोगों का स्मरण करना । (९) आगामी भोगों को भोगने की चिन्ता करना । (१०) शुक्र का क्षरण  अब्रह्म के कारणभूत द्रव्य-(१) विपुल आहार करना । (२) काय का शोधन (संस्कार) करना। (३) गंध, माला आदि धारण करना (४) गीत और बाजे सुनना ( ५ ) शयन स्थान का शोधन। (६) स्त्रीसंसर्ग (७) धन का संग्रह (८) पूर्व रति स्मरण (९) इन्द्रियजन्य विषयों में अनुराग (१०) पौष्टिक रसों का सेवन
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 4-Mar-2026

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