
Acharya Shri Umaswati
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दर्शनविशुद्धिर्विनयसंपन्नता शीलव्रतेष्वनतिचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगो शक्तितस्त्यागतपसी साधुसमाधि र्वैयावृत्यकरणम्-मर्हदाचार्यबहुश्रुत-प्रवचन भक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्व-मिति तीर्थंकरत्वस्य ॥२४॥
सुत्रार्थ- दर्शनविशुद्धि, विनयसंपन्नता, शील और व्रतों का अतिचार रहित पालन करना, ज्ञान में सतत उपयोग, सतत संवेग, शक्ति के अनुसार त्याग, शक्ति के अनुसार तप, साधु-समाधि, वैयावृत्य करना, अर्हत्भक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, आवश्यक क्रियाओं को न छोड़ना, मार्गप्रभावना और प्रवचन वात्सल्य – ये तीर्थंकर नामकर्म के आश्रव हैं ॥२४॥


भावार्थ
अर्थ: दर्शन विशुद्धि (भगवान अर्हन्त देव के द्वारा कहे गए निर्ग्रंथता रूप मोक्ष मार्ग में आठ अंग सहित रुचि का होना), विनय संपन्नता (मोक्ष के साधन सम्यग्ज्ञान वगैरह का आदर सत्कार करना), शीलव्रतेषु-अनतिचार (अहिंसा आदि व्रतों का और व्रतों का पालन करने के लिए बतलाए गए शीलों का अतिचार रहित पालन करना), अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग (सदा सम्यग्ज्ञान के पठन-पाठन में लगे रहना), संवेग (संसार के दुःखों से सदा उद्विग्न रहना), शक्तितः त्याग (शक्ति के अनुसार विधिपूर्वक दान देना), शक्तितः तप (अपनी शक्ति के अनुसार जैन मार्ग के अनुकूल तपस्या करना), साधु समाधि (तपस्वी मुनि के तप में किसी कारण से कोई विघ्न आ जाए तो उसे दूर करके उनके संयम की रक्षा करना), वैयावृत्यकरण (भगवान साधुओं पर विपत्ती आने पर निर्दोष विधी से उसका दूर करना), अर्हत्भक्ति, आचार्य भक्ति, बहुश्रुत भक्ति, प्रवचन भक्ति (अर्हत देव, आचार्य, उपाध्याय और आगम के विषय में विशुद्ध भाव पूर्वक अनुराग होना), आवश्यकपरिहाणि (सामायिक, स्तवन, वंदना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग इन छह आवश्यक कर्मों में कभी हानि न होने देना और प्रतिदिन नियत समय पर उन्हें बराबर करना), मार्ग प्रभावना (सम्यग्ज्ञान के द्वारा, दान, तप के द्वारा या जिन पूजा के द्वारा जगत में जैन धर्म का प्रकाश फैलाना), प्रवचन वात्सल्य (जैसे गौ को अपने बच्चे से सहज स्नेह होता है वैसे ही साधर्मियों को देखकर चित्त का प्रसन्न हो जाना) – ये सोलह भावनाएँ तीर्थंकर नाम कर्म के आश्रव में कारण हैं। इन सबका अथवा इनमें से कुछ का पालन करने से तीर्थंकर नाम कर्म का आश्रव होता है, किन्तु उनमें एक दर्शनविशुद्धि का होना आवश्यक है ॥२४॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf
English Meaning:
The influx (āsrava) of the Tīrthańkara name-karma (nāmakarma) is caused by these sixteen: purity of right faith – darśanaviśuddhi, reverence – vinayasampannatā, observance of vows and supplementary vows without transgression – śīlavratānaticāra, ceaseless pursuit of knowledge – abhīksna jñānopayoga, perpetual fear of the cycle of existence – samvega, giving gifts (charity) – tyāga, practising austerities according to one’s capacity – tapa, removal of obstacles that threaten the equanimity of ascetics – sādhusamādhi, serving the meritorious by warding off evil or suffering – vaiyāvrttya, devotion to the Omniscient Lord – arhatbhakti, devotion to the chief preceptors – ācāryabhakti, devotion to the preceptors – bahuśrutabhakti, devotion to the Scripture – pravacanabhakti, practice of the six essential daily duties – āvaśyakāparihāni, propagation of the teachings of the Omniscient Lord – prabhāvanā, and fervent affection for one’s brethren following the same path – pravacanavatsalatva.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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तीर्थंकर नामकर्म के आश्रव के कारणभूत सोलहकारण भावना
| क्रमांक | भावना | अर्थ |
|---|---|---|
| १ | दर्शन विशुद्धि | अर्हंत द्वारा कहे गए मोक्षमार्ग में रुचि |
| २ | विनय संपन्नता | रत्नत्रय और उनके धारकों की विनय |
| ३ | शीलव्रत में अनतिचार | शील और व्रतों का अतिचार रहित पालन |
| ४ | अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग | सम्यग्ज्ञान में निरंतर लीन रहना |
| ५ | संवेग | संसार के दुखों से भयभीत रहना |
| ६ | शक्ति अनुसार त्याग | शक्ति के अनुसार त्याग |
| ७ | शक्ति अनुसार तप | शक्ति के अनुसार तप |
| ८ | साधु समाधि | साधुओं के विघ्न दूर करना |
| ९ | वैयावृत्य करण | गुणी पुरुषों के दुख आने पर निर्दोष विधि से सेवा करना |
| १० | अर्हत भक्ति | अर्हंत में भावों की विशुद्धि के साथ अनुराग |
| ११ | आचार्य भक्ति | आचार्य में भावों की विशुद्धि के साथ अनुराग |
| १२ | बहुश्रुत भक्ति | उपाध्याय में भावों की विशुद्धि के साथ अनुराग |
| १३ | प्रवचन भक्ति | शास्त्र में भावों की विशुद्धि के साथ अनुराग |
| १४ | आवश्यकापरिहाणि | ६ आवश्यक क्रियाओं को यथासमय करना |
| १५ | मार्ग प्रभावान | ज्ञान, तप, दान, पुजा द्वारा धर्म का प्रकाश करना |
| १६ | प्रवचन वत्सलत्व | गोवत्सवत् साधर्मियों पर स्नेह रखना |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: जिनके ऊपर चन्द्रमा के समान धवल चौंसठ चंवर ढुरते हैं, ऐसे सकल भुवन के अद्वीतीय स्वामी को श्रेष्ठ मुनि तीर्थंकर कहते हैं। जो सकल लोक का एक अतुलनीय नाथ है, कुन्द के फूल के समान श्वेत चौंसठ चंवर ढुरते हैं वह तीर्थंकर है। रत्नत्रयात्मक मोक्षमार्ग को जो प्रचलित करते हैं उनको तीर्थंकर कहते हैं। जिसके द्वारा भव्य जीव संसार को तिरते हैं वह तीर्थ है। कुछ भव्य श्रुत अथवा आलंबनभूत गणधरों के द्वारा संसार को तिरते हैं। अतः श्रुत और गणधरों को भी तीर्थ कहते हैं। इन दोनों तीर्थों को जो करते हैं वे तीर्थंकर हैं अथवा “तिसु तिट्ठदित्ति तीत्थं” इस व्युत्पत्ति के अनुसार तीर्थ शब्द से रत्नंत्र्य रूप मार्ग कहा जाता है, उसके करने से तीर्थंकर होता है। वे मति आदि चार ज्ञान के धारी होते हैं। संसार समुद्र से पार होने के उपाय रूप तीर्थ को करने वाले तीर्थंकर हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
उत्तर: तीर्थंकर के पाँच कल्याणक होते हैं– (१) गर्भ कल्याणक (२) जन्म कल्याणक (३) तप कल्याणक (४) ज्ञान कल्याणक (५) मोक्ष कल्याणक।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 03 March 2026.
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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