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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
वीचारोऽर्थव्यञ्जनयोगसंक्रान्तिः ॥४४॥
Meaning
व्यञ्जन और योग की संक्रान्ति (बदलना) सो वीचार है॥४४॥

भावार्थ

ध्यान योग्य द्रव्य वा पर्याय । व्यञ्जन = वचन | योग मन वचन काय की क्रिया । संक्रांति परिवर्तन । अर्थ संक्रान्ति ध्यान करते समय द्रव्य को छोड़कर पर्याय का ध्यान करना और पर्याय को छोड़कर द्रव्य का ध्यान करना अर्थात् ध्यान के विषय का कुछ बदलना अर्थसंक्रान्ति है। व्यञ्जन संक्रान्ति – श्रुत के किसी एक वाक्य को छोड़कर दूसरे वाक्य का सहारा लेना । उसे भी छोड़कर तीसरे वाक्य का सहारा लेना। इसी प्रकार ध्यान करते समय वचन के बदलने को व्यञ्जन संक्रान्ति कहते हैं। योगसंक्रान्ति – काययोग को छोड़कर अन्ययोग का ग्रहण करना। उसे भी छोड़कर काययोग को ग्रहण करना योगसंक्रान्ति है। इन तीनों प्रकार की संक्रान्ति को वीचार कहते हैं। जिस ध्यान में इस तरह का वीचार होता है वह वीचार सहित है और जिसमें ऐसा चार नहीं होता वह वीचार रहित है॥४४॥ Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book

English Meaning:

Vīcāra’ is shifting (samkrānti) with regard to object (artha), word (vyanjana) and, activity (yoga). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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वितर्क विचार
वितर्क
=
श्रुत
=
विशेष रूप से तर्कणा या विचार करना
विचार
=
संक्रान्ति
=
परिवर्तन (पलटना)
किसका
अर्थ
व्यञ्जन
योग
द्रव्य और पर्याय
वचन या शब्द
मन, वचन या काय की क्रिया
शुक्लध्यान
नामपृथक्त्व
वितर्क-विचार
एकत्व वितर्क
अविचार
सूक्ष्मक्रिया
अप्रतिपाती
व्युपरत
क्रियानिवृत्ति
स्वरूपपृथक्त्व = भिन्न-भिन्न =
विविध =
विचार =
परिवर्तन सहित

वितर्क =
भावश्रुत
ज्ञान में जबर्दस्त
विचार
एकत्व = एक में
(द्रव्य या पर्याय)
वितर्क =
भावश्रुत ज्ञान
के बल से
अविचार =
परिवर्तन रहित
सूक्ष्म क्रिया =
सूक्ष्म काय
योग में स्थित
अप्रतिपाती =
जिससे
गिरना नहीं
व्युपरत
क्रिया =
समस्त योगों
से निवृत्ति
क्रियानिवृत्ति =
संसार से
अभी निवृत्ति
नहीं
गुणस्थान8-111213 के अन्त में14
स्वामीश्रुत केवलीश्रुत केवलीकेवलीकेवली
योगतीन योगकोई एक योगकाय योगयोग नहीं
कौन सा
फलमोहनीय का
उपशम व क्षय
शेष 3 घातिया
कर्मों का क्षय
योग का
अभाव
4 अघातिया
कर्मों का क्षय
अयोगी मोक्ष
सहेलनउत्तम 3 सहेलनजघन्यतम
नाराच
जघन्यतम
नाराच
जघन्यतम
नाराच
दृष्टांतदीपक की लौमणि का
प्रकाश
सूर्य का प्रकाश

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer  आगम में ऐसा भी सुना जाता है कि जिनका शरीर वज्रमयी है और जो महा शक्तिशाली हैं, ऐसे पुरुष सभी आसनों से विराजमान होकर ध्यान के बल से अविनाशी पद को प्राप्त हुए हैं। इसलिए कायोत्सर्ग और पर्यंकासन का निरूपण असमर्थ जीवों की अधिकता से किया गया है। जो उपसर्ग आदि को सहन करने में अतिशय समर्थ हैं ऐसे मुनियों के लिए अनेक प्रकार के आसनों को लगाने में दोष नहीं है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer ध्यान के समय छोड़ने योग्य स्थान-(१) म्लेच्छ पापी जन के रहने का एवं दुष्ट राजा के अधिकार का स्थान ।(२) पाखंडी भेषियों के समूह से घिरा हुआ एवं महामिथ्यात्व का स्थान ।(३) कुलदेवता, योगिनी, रुद्र, नीच देवादिक का स्थान ।(४) जहाँ वेताल नाचते हों, चंडिका देवी के भवन का प्रांगण तथा व्यभिचारिणी का संकेतित(५) द्यूतक्रीड़ा करने वाले, मद्यपायी व्यभिचारी एवं बन्दीजनों का स्थान।(६) नास्तिकों से सेवित, राक्षस, कामीजन, अग्निजीवी, रजस्वला, भ्रष्टचारित्री, नपुंसक एवं अंगहीनों का स्थान ।(७) जहाँ दुःशील खोटे पुरुषों ने अचिन्त्य साहसिक कार्य रचा हो, जमीदारी, जाति और कुल से उत्पन्न हुई शक्ति से ‘यह हमारा स्थान है’ ऐसे गर्व से प्रवेश का निषेध करते हों ।(८) क्रूरकर्म और अभिचार से पूर्ण स्थान ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 12-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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