
Acharya Shri Umaswati
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Sutra
आलोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्गतपश्छेद-परिहारोपस्थापनाः॥२२॥
Meaning
आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार और उपस्थापना ये प्रायश्चित्त के नौ भेद हैं॥२२॥


भावार्थ
आलोचन, प्रतिक्रमण, तदुभय यानी आलोचन और प्रतिक्रमण दोनों, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार और उपस्थापना ये नौ भेद प्रायश्चित के हैं। गुरु से अपने प्रमाद को निवेदन करने का नाम आलोचना है। वह आलोचना दस दोषों को बचाकर करनी चाहिए। वे दोष इस प्रकार हैं- आचार्य अपने ऊपर दया करके थोड़ा प्रायश्चित दें, इस भाव से आचार्य को पीछी कमण्डलु आदि भेंट करके दोष का निवेदन करना आकम्पित दोष है । गुरु की बातचीत से प्रायश्चित का अनुमान लगाकर दोष का निवेदन करना अनुमापित दोष है। जो दोष किसी ने करते नहीं देखा उसे छिपा जाना और जो दोष करते देख लिया उसे गुरु से निवेदन करना दृष्टि दोष है। केवल स्थूल दोष का निवेदन करना बादर दोष है। महान् प्रायश्चित के भय से महान दोष को छिपा लेना और छोटे दोष का निवेदन करना सूक्ष्म दोष है। दोष निवेदन करने से पहले गुरु से पूछना कि महाराज ! यदि कोई ऐसा दोष करे तो उसका क्या प्रायश्चित होता है, यह छन्न दोष है । प्रतिक्रमण के दिन जब बहुत से साधु एकत्र हुए हों और खूब हल्ला हो रहा हो उस समय दोष का निवेदन करना, जिससे कोई सुन न सके, शब्दाकुलित दोष है। गुरु ने जो प्रायश्चित दिया है वह उचित है या नहीं ऐसी आशंका से अन्य साधुओं से पूछना बहुजन नाम का दोष है। गुरु से दोष न कहकर अपने सहयोगी अन्य साधुओं से अपना दोष कहना अव्यक्त नाम का दोष है। और गुरु से निवेदन न करके, जिस साधु ने अपने समान अपराध किया हो उससे जाकर पूछना कि तुझे गुरु ने क्या प्रायश्चित दिया है, क्योंकि तेरे समान ही मेरा भी अपराध है जो प्रायश्चित तुझे दिया है वही मेरे लिए भी युक्त है, यह तत्सेवी नाम का दोष है। इस तरह दस दोष रहित प्रमाद का निवेदन करना आलोचना प्रायश्चित है। प्रमाद से दोष मुझ से हुआ वह मिथ्या हो इस तरह अपने किए हुए दोष के विरुद्ध अपनी मानसिक प्रतिक्रिया को प्रकट करना प्रतिक्रमण है। कोई अपराध तो केवल आलोचना से ही शुद्ध हो जाता है कोई प्रतिक्रमण से शुद्ध होता है और कोई आलोचना और प्रतिक्रमण दोनों से शुद्ध होता है यही तदुभय प्रायश्चित है । सदोष आहार तथा उपकरणों का संसर्ग होने पर उसका त्याग करना विवेक प्रायश्चित है। कुछ समय के लिए कायोत्सर्ग करना व्युत्सर्ग प्रायश्चित है। अनशन आदि करना तप प्रायश्चित है। दीक्षा के समय को छेद देना, जैसे कोई बीस वर्ष का दीक्षित साधु है, अपराध करने के कारण उसकी दस वर्ष की दीक्षा छेद दी गई, अतः अब वह दस वर्ष का दीक्षित माना जाएगा और जो दस वर्ष से एक दिन अधिक के भी दीक्षित साधु है उन्हें इसे नमस्कार आदि करना होगा। यह छेद प्रायश्चित है। कुछ समय के लिए संघ से निकाल देना परिहार प्रायश्चित है । और पुरानी दीक्षा को छेदकर फिर से दीक्षा देना उपस्थापना प्रायश्चित है || २२ ॥Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
English Meaning:
The nine subdivisions of expiation-prāyaścitta – are confession – alocanā, repentance – pratikramana, combination of the first two-tadubhaya, discrimination – viveka, giving up attachment to the body – vyutsarga, penance – tapa, suspension-cheda, expulsion – parihāra, and reinitiation – upasthāpanā.
Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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प्रायश्चित्त
| प्रायश्चित्त | स्वरूप |
|---|---|
| 1. आलोचना | गुरु के समक्ष अपने दोषों का निवेदन करना |
| 2. प्रतिक्रमण | ‘मेरे दोष मिथ्या हों’ ऐसे भावों को वचनों से प्रकट करना |
| 3. तदुभय | आलोचना व प्रतिक्रमण दोनों साथ में करना |
| 4. विवेक | सदोष अन्न, पात्र, उपकरणादि मिलने पर उनका त्याग |
| 5. व्युत्सर्ग | नियमित काल के लिए कायोत्सर्ग करना |
| 6. तप | अनशनादि |
| 7. छेद | कुछ समय की दीक्षा का छेद करना |
| 8. परिहार | कुछ समय के लिए संघ से दूर करना |
| 9. उपस्थापन | पूर्ण दीक्षा छेद कर पुनः दीक्षा प्राप्त करना |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
Answer यह प्रायश्चित्त तप दोषों का निराकरण, शल्यों का अभाव, मर्यादा का पालन, संयम की स्थिरता और चित्त में अत्यन्त शान्ति की प्राप्ति होना आदि प्रमुख कार्यों की सिद्धि के लिए किया जाता है । प्रमाद से लगे दोषों का निराकरण, भावप्रसाद – परिणामों की निर्मलता, निःशल्यत्व-भावों की शल्य के निराकरण, अव्यवस्था के निस्तारण, मर्यादा के पालन, संयम की दृढ़ता, आराधना की सिद्धि आदि के लिए नव प्रकार का प्रायश्चित्त तप किया जाता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
Answer जो मूर्ख अभिमानी मुनि अपने तपश्चरण को महा तपश्चरण समझकर व्रतादि के दोषों को शुद्ध करने के लिए प्रायश्चित्त नहीं करता उसके समस्त व्रतों तथा समस्त तपश्चरण को वे दोष शीघ्र नष्ट कर देते हैं तथा उन व्रत और तप के नाश के साथ-साथ उसके समस्त गुण नष्ट हो जाते हैं। जैसे कि सड़ा हुआ एक पान अन्य सब पानों को सड़ा देता है, उसी प्रकार एक ही दोष से सब व्रत, तप, गुण नष्ट हो जाते हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 10-Mar-2026
Courtesy:
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