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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
सचित्तनिक्षेपापिधान-परव्यपदेश-मात्सर्य – कालातित्रमाः ॥३६॥
Meaning
 सचित्तनिक्षेप, सचित्त – अपिधान, परव्यपदेश, मात्सर्य और कालातिक्रम ये अतिथि संविभाग व्रत के अतिचार हैं॥ ३६ ॥

भावार्थ

सचित्त निक्षेप (सचित्त कमल के पत्ते वगैरह पर रखकर आहार दान देना ), चित्त अपिधान (आहार को सचित्त पत्ते वगैरह से ढँक देना), परव्यपदेश (स्वयं दान न देकर दूसरे से दिलवाना अथवा दूसरे का द्रव्य उठाकर स्वयं दे देना ), मात्सर्य (आदर पूर्वक दान न देना अथवा अन्य दाताओं से ईर्ष्या करना), कालातिक्रम ( मुनियों को अयोग्य काल में भोजन कराना) ये पाँच अतिथि संविभाग व्रत के अतिचार हैं ॥ ३६ ॥ Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Placing the food on things with organisms such as green leaves – sacittanikṣepa, covering it with such things – sacittapidhāna, giving the food of another host – paravyapadesa, envy – mātsarya, and untimely food – kālātikrama, are the five transgressions of the supplementary vow of partaking of one’s food after feeding the ascetic – atithisamvibhāgavrata. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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अतिथि संविभाग व्रत
flowchart TB

A["अतिथि संविभाग व्रत"]
A --> B["(सभी आहार दान से सम्बन्धित)"]

%% Main branches
B --> C["सचित्त"]
B --> F["परव्यपदेश"]
B --> G["मात्सर्य"]
B --> H["कालातिक्रम"]

%% Sub branches of सचित्त
C --> D["निक्षेप <br>  सचित्त आहार रखना"]
C --> E["अपिधान <br>  सचित्त द्वारा आहार को ढाँकना"]

%% Other branches descriptions
F --> F1[" अन्य की वस्तु है - यह कह कर दान देना"]
G --> G1[" अनादर से देना और अन्य दातार से ईर्ष्या करना"]
H --> H1[" भिक्षा काल का उल्लंघन करके दान देना"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer सचित्त कमल पत्र आदि पर रखी हुई वस्तु सचित्तनिक्षेप कहलाती है । (रा. वा. १) हरे कमल पत्र आदि पर आहार को रखना हरितपिधान नामका अतिचार है।अपिधान और आवरण ये एकार्थवाची हैं। प्रकरणवश सचित्त से ढकना सचित्तापिधान है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer अतिथि को आहार देते समय आदर भाव के बिना देना मात्सर्य है। (रा.वा. ४) अन्य दाता के दान तथा गुणों के विषय में सहनशीलता का नहीं होना मत्सरत्व कहलाता है। (र.क. श्रा. १२१ टी) देते हुए भी आदर का अभाव होना अनादर कहा है । आहारादि दान इस समय ऐसे पात्र के लिए देना चाहिए अथवा देने योग्य वस्तुओं में यह वस्तु दी है अथवा नहीं दी है इस प्रकार की स्मृति का अभाव होना अस्मरण कहलाता है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 6-Mar-2026

Courtesy:
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