
Acharya Shri Umaswati
Read About Acharya Umaswami
here
–
सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्ते स बन्धः ॥२॥
सूत्रार्थ– कषाय सहित होने से जीव कर्म के योग्य पुद्गलों को ग्रहण करता है, वह बन्ध है ॥२॥


भावार्थ
अर्थ : कषाय सहित होने से जीव जो कर्म के योग्य पुद्गलों को ग्रहण करता है उसे बन्ध कहते हैं। ॥२॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf
English Meaning:
The living being – jīva, the soul – actuated by passions (kasāya), retains particles of matter (pudgala) fit to turn into karmas. This is bondage (bandha).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

Tilt phone to see complete table.
बन्ध क्या है
| क्या हो रहा है? | बन्ध |
| किसका? | योग्य कार्मण वर्गणा का (पुद्गल का) |
| किसे? | कषाय सहित जीव को (संसारी मूर्तिक जीव) |
| कब से? | अनादि से |
कर्म बन्ध चक्र
%%{init: {'theme':'base','themeVariables':{
'background':'#ffffff',
'primaryColor':'#ffffff',
'primaryBorderColor':'#000000',
'lineColor':'#000000',
'textColor':'#000000'
}}}%%
flowchart TB
A["पूर्व बन्ध<br>द्रव्य कर्म का उदय"]
B["जीव भाव कर्म करता<br>(मोह, राग आदि)"]
C["नया द्रव्य कर्म<br>बन्ध होता"]
D["पुनः वही चक्र चलता है"]
E["यहाँ जीव पुरुषार्थ से<br>इस चक्र को रोक सकता है"]
A --> B
B --> C
C --> D
D --> A
B -.-> E
style A fill:#FFE082,width:240px
style B fill:#E1F5FE,width:240px
style C fill:#E8F5E9,width:240px
style D fill:#FFF3E0,width:220px
style E fill:#FFCDD2,width:260pxद्रव्यकर्म-भवकर्म निमित्त-उपादान
| कार्य | उपादान कारण (कर्ता) | निमित्त कारण |
|---|---|---|
| (स्वयं कार्य रूप परिणाम) | (स्वयं कार्य रूप न परिणमे, पर कार्य की उत्पत्ति में सहायक हो) | |
| द्रव्य बंध (द्रव्य कर्म) | कार्मण वर्गणा | जीव के योग व कषाय |
| भाव बंध (भाव कर्म) | जीव के योग कषाय की पूर्व पर्याय | उदय / उदीरणा को प्राप्त कर्म |
| दृष्टान्त – घड़ा | मिट्टी | कुम्भकार |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: अमूर्तिक, बिना हाथ-पैर वाला जीव कर्मों को ग्रहण कैसे करता है इस शंका का निराकरण करने के लिए सूत्र में ‘जीव’ शब्द का ग्रहण किया है क्योंकि जीवन का अर्थ आयु है और आयु सहित जीव ही कर्मबंध को ग्रहण करता है, आयु से रहित सिद्ध जीव कर्मों का ग्रहण नहीं करता है अतः जीव वचन का ग्रहण किया गया है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
उत्तर : कर्म को आत्मा का गुण मानना उचित नहीं है क्योंकि अमूर्तिक आत्मा का गुण भी अमूर्तिक होगा और अमूर्तिक कर्म उपग्रह (उपकार) और उपघात कर नहीं सकते। जैसे- अमूर्तिक आकाश अमूर्तिक दिशाओं का उपघातक और अनुग्राहक नहीं है, उसी प्रकार अमूर्तिक कर्म भी अमूर्तिक आत्मा के उपघातक और अनुग्राहक नहीं हो सकते।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 5-Mar-2026
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
All Sutras Chapter2
All Chapters
- Tatvartha Sutra – Chapter 1 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 2 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 3 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 4 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 5 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 6 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 7 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 8 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 9 – Index
- Tatvartha Sutra – Chapter 10 – Index