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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
व्रत-शीलेषु पंच पंच यथाक्रमम् ॥२४॥
Meaning
अहिंसादिक अणुव्रतों में और दिग्विरति आदि शीलों में क्रम से पाँच-पाँच अतिचार कहते हैं॥२४॥

भावार्थ

अहिंसा आदि पांच व्रतों और दिव्रत आदि सात शीलों में भी क्रम से पांच-पांच अतिचार होते हैं, जिनका वर्णन आगे के सूत्रों में है। Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book

English Meaning:

There are five transgressions for each of the vows (vrata) and the supplementary-vows (śīlavrata). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer यद्यपि इस सूत्र में गृहस्थ और मुनि आदि विशेषण नहीं है तथापि आगे कहे जाने वाले वध, बन्धन, छेद आदि वचन के सामर्थ्य से ज्ञात होता है कि ये अतिचार गृहस्थों के व्रतों के हैं अत: आगे के अतिचार के सामर्थ्य से यहाँ गृहस्थ के व्रतों का ग्रहण होता है क्योंकि ‘वधबन्ध …..’ आदि गृहस्थों के ही व्रतों के अतिचार हो सकते हैं, अनगार के नहीं ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer सूत्र में ‘पञ्च’ शब्द का वीप्सा अर्थ में दो बार ग्रहण किया है। इसका प्रयोजन यह है कि जो भिन्न-भिन्न निर्देश में व्रत – शील कहे गये हैं, वे प्रत्येक पाँच अतिचार सहित हैं ।  यद्यपि सूत्र में लाघव के लिए ‘शब्’ प्रत्यय करके पञ्चशः शब्द का प्रयोग भी किया जा सकता था तथापि अर्थ को स्पष्ट करने के लिए (प्रत्येक के पाँच-पाँच अतिचार हैं, सभी के नहीं) पञ्च शब्द का द्वित्व निर्देश किया है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026

Courtesy:
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