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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोषिता ॥ २२ ॥
Meaning
मरण काल उपस्थित होने पर गृहस्थ को प्रीतिपूर्वक सल्लेखना करना चाहिए॥ २२ ॥

भावार्थ

सम्यक् रीति से काय को और कषाय को क्षीण करने का नाम सल्लेखना है। जब मरण काल उपस्थित हो तो गृहस्थ को सबसे मोह छोड़कर धीरे-धीरे खाना- पीना भी छोड़ देना चाहिए और इस तरह शरीर को कृश करने के साथ ही कषायों को भी कृश करना चाहिए तथा धर्मध्यान पूर्वक मृत्यु का स्वागत करना चाहिए । Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Futher, the householder adopts, with a sense of contentment, the practice of dispassionately abandoning his body – ‘sallekhanā’ – at the end of his life. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


सल्लेखना (अच्छे प्रकार से कूष करना)
सल्लेखना (अच्छे प्रकार से कूष करना)
भेद काय कषाय
(बाहरी शरीर) (भीतरी परिणाम)
कैसे
करें
अनशन, रस परित्यागादि
के क्रम से
शुभ ध्यान, स्वाध्यायादि पूर्वक
निज परमात्म स्वरूप के सेवन से
किस
प्रकार
कूष करें
इतना ही कूष करें कि
परिणाम आकुलित होकर,
आराधना से चलायमान न हों
इस प्रकार कि मोह, राग, द्वेषादि से
अपना ज्ञान-दर्शन रूप परिणाम
मलिन न हो
व्रती मरण के अंत में इसे प्रीतिपूर्वक स्वीकार करता है।

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer अच्छी प्रकार से काय और कषाय का लेखन (कृश) करना सल्लेखना है । निष्प्रतिकार उपसर्ग आने पर, दुर्भिक्ष होने पर, बुढ़ापा आने पर और मृत्युदायक रोग होने पर धर्मार्थ शरीर छोड़ने को सल्लेखना कहते हैं। (र.क. श्रा. १२२) बाहरी शरीर और अभ्यन्तर कषायों का उत्तरोत्तर काय और कषाय के पुष्ट करने वाले कारणों को घटाते हुए भले प्रकार लेखन करना सल्लेखना है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer श्रामण्य धर्म की हानि करने वाली अतिशय वृद्धावस्था आने पर, निष्प्रतिकार देव, मनुष्य व तिर्यञ्चकृत उपसर्ग आ जाने पर, अनुकूल (कषायाभिभूत) शत्रु जब चारित्र का नाश करने को उद्युक्त हो जाय, भयंकर दुष्काल आ पड़ने पर, हिंसक पशुओं से पूर्ण भयानक वन में दिशा भूल जाने पर, कंकर- पत्थर के कारण जहाँ चलना दुष्कर हो, ऐसे जंगल में फँस जाने पर, आँख, कान व जंघा बल अत्यन्त क्षीण १. संकल्पपूर्वक मरण की तैयारी ही सल्लेखना है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026

Courtesy:
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