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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
दिग्देशानर्थदण्डविरति – सामायिक- प्रोषधोपवासोपभोग- परिभोगपरिमाणातिथिसंविभागव्रतसम्पन्नश्च॥२१॥
Meaning
दिग्विरति, देशविरति, अनर्थदंड विरति, सामायिक, प्रोषधोपवास, उपभोग परिभोग परिमाण और अतिथि संविभाग इन सात व्रतों से सहित गृहस्थ अणुव्रती होता है॥२१॥

भावार्थ

पूर्व आदि दिशाओं में नदी, ग्राम, नगर आदि प्रसिद्ध स्थानों की मर्यादा बाँधकर जीवन पर्यंत उससे बाहर न जाना और उसी के भीतर लेन-देन करना दिग्विरति व्रत है। इस व्रत के पालने से गृहस्थ मर्यादा के बाहर किसी भी तरह की हिंसा नहीं करता। इसलिए उस क्षेत्र की अपेक्षा से वह महाव्रती सा हो जाता है तथा मर्यादा के बाहर व्यापार करने से प्रभूत लाभ होने पर भी व्यापार नहीं करता है। अतः लोभ की भी कमी होती है। दिग्विरति व्रत की मर्यादा के भीतर कुछ समय के लिए देश का परिमाण कर लेने को देश – विरति व्रत कहते हैं। इसमें भी उतने समय के लिए श्रावक मर्यादा से बाहर के क्षेत्र में महाव्रती के तुल्य हो जाता है जिससे अपना कुछ लाभ तो न हो और व्यर्थ ही पाप का संचय होता हो ऐसे कामों को अनर्थदंड कहते हैं और उनके त्याग को अनर्थ दंड विरति कहते हैं । अनर्थ दंड के पाँच भेद हैं- अपध्यान, पापोपदेश, प्रमादाचरित, हिंसादान और अशुभश्रुति । दूसरों का बुरा विचारना कि अमुक की हार हो, अमुक को जेलखाना हो जाए, उसका लड़का मर जाए, यह सब अपध्यान है। दूसरों को पाप का उपदेश देना यानी ऐसे व्यापार की सलाह देना जिससे प्राणियों को कष्ट पहुँचे अथवा युद्ध वगैरह के लिए प्रोत्साहन मिले, पापोपदेश है। बिना जरूरत के जंगल कटवाना, जमीन खुदवाना, पानी खराब करना आदि प्रमादाचरित है। विषैली गैस, अस्त्र शस्त्र आदि हिंसा की सामग्रीदेना हिंसादान है। हिंसा और राग आदि की बढ़ाने वाली दुष्ट कथाओं का सुनना, सुनाना आदि अशुभ श्रुति है। इस प्रकार के अनर्थ दंडों का त्याग करना अनर्थ दंड विरति है । तीनों संध्याओं में समस्त पाप के कर्मों से विरत होकर नियत स्थान पर नियत समय के लिए मन, वचन और काय के एकाग्र करने को सामायिक कहते हैं। जितने समय तक गृहस्थ सामायिक करता है उतने समय के लिए वह महाव्रती के समान हो जाता है। प्रोषध नाम पर्व का है और जिसमें पाँचों इन्द्रियाँ अपने अपने विषय से निवृत्त होकर उपवासी रहती हैं, उसे उपवास कहते हैं । प्रोषध अर्थात् पर्व के दिन उपवास करने को प्रोषधोपवास कहते हैं। मोटे तौर पर तो चारों प्रकार के आहार का त्याग करना उपवास कहलाता है किंतु यथार्थ में तो सभी इन्द्रियों का विषय भोग से निवृत्त रहना ही उपवास है। इसी के लिए भोजन का त्याग किया अतः उपवास के दिन श्रावक को सब आरंभ छोड़कर और स्नान, तेल, फुलेल, आदि न लगाकर चैत्यालय में अथवा साधुओं के निवास स्थान पर या अपने ही घर के किसी एकान्त स्थान पर धर्म चर्चा करते हुए उपवास का समय बिताना चाहिए । खानपान, गंध माला वगैरह को उपभोग कहते हैं और वस्त्र आभरण अलंकार, सवारी, मकान वगैरह को परिभोग कहते हैं। कुछ समय के लिए अथवा जीवन पर्यंत के लिए उपभोग और परिभोग का परिमाण करना कि मैं इतने समय तक इतनी वस्तुओं से ही अपना काम चलाऊँगा, यह उपभोग परिभोग परिमाण व्रत है। जो अपने संयम की रक्षा करते हुए विहार करता है उसे अतिथि कहते हैं। अथवा जिसके आने का कोई दिन निश्चित नहीं होता है वह अतिति है। मोक्ष के लिए तत्पर संयमी अतिथि को शुद्ध चित्त से निर्दोष भिक्षा देना अतिथि संविभाग व्रत है। ऐसे अतिथियों को आवश्यकता पड़ने पर योग्य औषध देना, रहने को स्थान देना, धर्म के उपकरण पिच्छी कमंडलु और शास्त्र वगैरह देना भी इसी व्रत में सम्मिलित है। इस सूत्र में ‘च’ शब्द गृहस्थ के आगे कहे जाने वाले सल्लेखना धर्म को ग्रहण करने के लिए दिया है Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The householder with minor-vows (aṇuvrata) is also equipped with these supplementary vows: withdrawing from activity with regard to the direction – digvirati, withdrawing from activity with regard to the country – deśavirati, withdrawing from purposeless sin – anartha- daṇḍavirati, periodic concentration – sāmāyikavrata, fasting at regular intervals – proṣadhopavāsavrata, limiting consumable and non-consumable things upabhogaparibhogapaimāṇavrata, and partaking of one’s food after feeding the ascetic – atithisamvibhāgavrata. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


7 शीलव्रत
flowchart TB

A["7 शीलव्रत"]

A --> B["गुणव्रत <br><br> (अणुव्रतों का उपकार करें)"]
A --> C["शिक्षाव्रत <br><br> (मुनिव्रत पालन की शिक्षा मिले)"]

%% Gunvrat section
B --> B1["दिग्व्रति <br> * पूर्वादि 10 दिशाओं में प्रसिद्ध चिह्नों के द्वारा जीवनपर्यंत की मर्यादा करना"]
B --> B2["देशव्रति <br><br> * ग्रामादिक की निश्चित काल के लिए मर्यादा करना"]
B --> B3["अनर्थदण्ड विरति <br><br> * उपकार न होकर जो प्रवृत्ति केवल पाप का कारण है, उसका त्याग करना"]

%% Shikshavrat section
C --> C1["सामायिक व्रत <br><br><br> * समस्त पाप योग क्रिया व राग-द्वेष का त्याग, साम्यभाव को प्राप्त हो शुद्ध आत्मस्वरूप में लीन होना"]
C --> C2["प्रोषधोपवास व्रत <br><br><br> * पर्व के दिनों में सकल आरम्भ, विषय-कषाय व आहार का त्याग करना"]
C --> C3["उपभोगपरिभोग परिमाण व्रत <br><br><br> * न्यायपूर्वक उपभोग परिभोग में काल की मर्यादा लेकर त्याग करना"]
C --> C4["अतिथि संविभाग व्रत <br> * मोक्ष उद्यमी के लिए अपने भोजन, धनादि का विभाग करना"]

अनर्थदण्ड

flowchart TB

A["अनर्थदण्ड"]

A --> B["अपध्यान <br><br> * दूसरे की जय-पराजय, मृत्यु आदि कैसे हो, ऐसा मन में विचार करना"]

A --> C["पापोपदेश <br><br> * प्राणियों के हिंसा के कारण भूत वाणिज्य का प्रसार करने वाले आरम्भ आदि के वचन"]

A --> D["प्रमादचरित <br><br> * बिना प्रयोजन के पाप कार्य करना"]

A --> E["हिंसाप्रदान <br><br> * हिंसा के उपकरणों को प्रदान करना (देना)"]

A --> F["अशुभश्रुति <br><br> * हिंसा व राग आदि को बढ़ाने वाली कथा का सुनना व शिक्षा देना"]

उपभोग-परिभोग

flowchart TB

A["उपभोग-परिभोग"]

A --> B["उपभोग <br><br>
 जो वस्तु एक बार ही भोगने में आती है जैसे- भोजन, पानी, इत्र, पुष्प, माला आदि"]

A --> C["परिभोग <br><br>
 जो वस्तु अनेक बार भोगने में आती हैं गृह, वाहन, वस्त्र, आभूषण आदि"]


अतिथि संविभाग के योग्य सामग्री

flowchart TB

A["अतिथि संविभाग के योग्य सामग्री"]

A --> B["भिक्षा <br><br> * निर्दोष शुद्ध आहार"]

A --> C["उपकरण <br><br> * रत्नत्रय बढ़ाने में सहायक शास्त्र आदि"]

A --> D["औषध <br><br> * योग्य औषधि"]

A --> E["प्रतिश्रय (रहने का स्थान) <br><br> * ध्यान-अध्ययन के लिए"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer परमाणुओं की मर्यादा से विभाजित किये गये जो आकाश के श्रेणीबद्ध प्रदेश हैं वे ही दिशा के नाम से कहे जाते हैं । आकाश की प्रदेश श्रेणियों में ही सूर्य की गति, उदय और अस्त से परिछिन्न होने के कारण पूर्व-दक्षिण-पश्चिम-उत्तर, ऊर्ध्व, अधः दिशा तथा आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य और ईशान इन विदिशाओं का व्यवहार होता है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer दिग्व्रती को दिग्व्रत ग्रहण करने में प्रसिद्ध समुद्र, नदी, अटवी, वन, पर्वत, जनपद (देश) और योजनों के परिमाण से मर्यादा करनी चाहिए। जैसे- मैं उत्तर दिशा में हिमालय पर्वत से या इतने कोसों से आगे कभी नहीं जाऊंगा और न लेन-देन आदि करूंगा।  उन दिशाओं का परिमाण पर्वत आदि प्रसिद्ध चिह्नों से तथा योजनादि की गिनती से कर लेना चाहिए।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 5-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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