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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् ॥१२॥
Meaning
संवेग और वैराग्य के लिए संसार और काय (शरीर) के स्वभाव का विचार करना चाहिए॥१२॥

भावार्थ

 यह लोक अनादि-निधन है । वेत के आसन के ऊपर एक गोल झाँझ रखो और उस पर एक मृदंग खड़ा करो, ऐसा ही लोक का आकार है। इसमें भटकते हुए जीव अनंत काल से नाना योनियों में दुःख भोग रहे हैं। यहाँ कुछ भी नियत नहीं है । जीवन जल के बुलबुले के समान है, भोग सम्पदा बिजली की तरह चंचल है। इस तरह जगत का स्वभाव विचारने से संसार से अरुचि पैदा होती है। इसी तरह यह शरीर अनित्य है, दुःख का कारण है, निःसार है, अपवित्र है, इत्यादि काय का स्वरूप विचारने से विषयों में राग नहीं होता। अतः व्रती को जगत का और काय का स्वभाव भी विचारते रहना चाहिए ॥ १२ ॥Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

In order to cultivate fright at the misery of worldly

existence – samvega – and detachment to worldly objects – vairāgya – the nature of the universe – jagatsvabhāva – and the nature of the body – kāyasvabhāva – should also be contemplated. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


वृत्ति को वैराग्य बढ़ाने के लिए
flowchart TD

A["वृत्ति को वैराग्य बढ़ाने के लिए"] 

A --> B["संवेग"]
A --> C["वैराग्य"]

B --> B1["1 संसार से भय 

2 धर्म और धर्म के फल में रुचि"]


C --> C1["संसार"]
C --> C2["शरीर"]
C --> C3["भोगों से"]

पाँच पाप

flowchart TD

A["पाँच पाप"]

A --> B["हिंसा 
(असावधानी-प्रमाद पूर्वक 
प्राणों का वियोग - घात करना)"]

A --> C["झूठ 
(अयत्नाचार-प्रमाद सहित 
अप्रशस्त [दुःख-दायी, मिथ्या] 
वचन बोलना)"]

A --> D["चोरी 
(बिना दी हुई वस्तु का 
ग्रहण करना)"]

A --> E["अब्रत 
(रति जन्य सुख के लिए 
स्त्री-पुरुष की जो भी 
चेष्टा)"]

A --> F["परिग्रह 
(पर द्रव्य में 
ममता परिणाम)"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer आदिमान और अनादिमान परिणाम वाले द्रव्यों का समुदाय ही यह संसार है । जे तालवृक्ष के आकार वाला है, अनादिनिधन है । इस संसार में ये जीवात्माएँ देव – नारकी मानव और तिर्यञ्च स्वरूप चारों गतियों में अनेक प्रकार के दुःखों को भोग भोग कर परिभ्रमण कर रही हैं। इसमें कोई भी वस्तु नियत वा स्थिर नहीं है, जीवन जल बुदबुदे के समान चपल है, भोग-सम्पदा विद्युत् और मेघ के समान क्षणभंगुर है, इस प्रकार जगत् के स्वभाव का विचार करना चाहिए।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer शरीर अनित्य है, दुःख का हेतु है, निस्सार है और अशुचि है, आदि भावना शरीर क विचार है।  यह शरीर रूपी झोपड़ा माता के रज और पिता के वीर्य से उत्पन्न हुआ है, हड्डी आदि सप्तधातु स्वरूप है, महा अशुभ है, भूख-प्यास, काम, वृद्धावस्था, क्रोध और अनेक प्रकार के रोगों की ज्वालाओं से व्याप्त है तथा विष्टादि महा अपवित्र पदार्थों का घर है, अत्यन्त निन्दनीय है, पीव के समान इससे दुर्गन्ध छूटती रहती है, यमराज का आश्रय है, क्षणभर में विनाशीक है, आदि भावना करनी चाहिए।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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