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Acharya Shri Umaswati
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भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः क्षान्तिः शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥१२॥
सुत्रार्थ- भूत-अनुकम्पा, व्रती-अनुकम्पा, दान और सरागसंयम आदि का योग तथा क्षान्ति और शौच – ये सातावेदनीय कर्म के आस्रव हैं ॥१२॥




भावार्थ

अर्थ: प्राणियों पर और व्रती पुरुषों पर दया करना यानी उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना, दूसरों के कल्याण की भावना से दान देना, राग सहित संयम का पालन, आदि शब्द से संयमा संयम, (एक देश संयम का पालन), अकाम निर्जरा (अपनी इच्छा न होते हुए भी परवश होकर जो कष्ट उठाना पड़े, उसे शांति के साथ सहन करना), बालतप (आत्म ज्ञान रहित तपस्या करना), इनको मनोयोग पूर्वक करना, क्षान्ति (क्षमा भाव रखना), शौच (सब प्रकार के लोभ को छोड़ना) इस प्रकार के कर्मों से सातावेदनीय कर्म का आस्रव होते हैं। यहाँ इतना विशेष जानना कि यद्यपि प्राणियों में व्रती भी आ जाते है, फिर भी जो  व्रतीयों का अलग ग्रहण किया है सो उनकी ओर विशेष लक्ष्य दिलाने के उद्देश्य से किया है ॥१२॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

Compassion (anukampā) towards the living-beings (bhūta) in general and the devout (vratī) in particular, charity (dāna), restraint-with-attachment (sarāgasamyama), etc., contemplation on the aforementioned, equanimity (ksānti), and purity (śauca) – freedom-from-greed – lead to the influx (āsrava) of karmas that cause pleasant-feeling (sātā vedanīya).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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साता वेदनीय

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flowchart TB
    A["साता वेदनीय"] --> B["अनुकम्पा
(दूसरे की पीड़ा को
अपनी पीड़ा मानना)"] & C["दान
(जिन व्रत के उदय हेतु
अपनी वस्तु का अर्पण)"] & D["सरागसंयम आदि
1. संयमसंयम
2. बल तप
3. अकाम निर्जरा"] & E["क्षान्ति
(शुभ परिणाम भावना पूर्वक
दोषों का निराकरण)"] & F["शौच
(शुभ परिणाम भावना पूर्वक
लोभ का त्याग)"]
    B --> G["किसके प्रति"]
    G --> H["भूत
(प्राणी मात्र)"] & I["व्रती
(अनुव्रत या महाव्रत से युक्त)"]

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: अहिंसादि व्रतों को धारण करने वाले व्रती कहलाते हैं। वे व्रती दो प्रकार के हैं श्रावक और मुनि। अगार (घर) के प्रति अनुरक्त संयतिजन अगार है। और संयतासंयत गृहस्थ एकदेशव्रती है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर: आयु कर्म और नामकर्मों के उदय की आधीनता से जो उन-उन गतियों में उत्पन्न होते हैं, वे भूत हैं तथा व्रती (अनुव्रत और महाव्रती) का सब ओर से सम्बन्ध रखने वाले प्राणी, व्रती हैं जो सागार और अनगार के भेद से दो प्रकार के हैं। अर्थात् सामान्य प्राणियों पर अनुकम्पा परिणाम की अपेक्षा व्रतियों पर अनुकम्पा परिणाम करने से विशेष्ट अनुभाग वाला साता वेदनीय कर्म का आस्रव होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 02 March 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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