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Acharya Shri Umaswati
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निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्द्वित्रिभेदाः परम् ॥९॥
सुत्रार्थ- पर अर्थात् अजीवाधिकरण क्रम से दो, चार, दो और तीन भेद वाले निवर्तन, निक्षेप, संयोग और निर्यग् रूप हैं ॥९॥




भावार्थ

अर्थ: निवर्तना के दो भेद, निक्षेप के चार भेद, संयोग के दो भेद और निर्यग् के तीन भेद, ये सब अजीवाधिकरण के भेद हैं। ॥९॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The non-living (ajīva) substratum (adhikarana) comprises production (nirvartanā), placing (niksepa), combining (samyoga) and activation (nisarga) of two, four, two, and three kinds, respectively.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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अजीव अधिकरण

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flowchart TB
    A["अजीव अधिकरण"] --> B["निवर्तना (रचना करना)
2 भेद

मूल गुण
(अंतरंग साधन)
• शरीर
• वचन
• मन
• प्राण
• अपान

उत्तर गुण
(बहिरंग साधन)
• काय कर्म
• विविध क्रियाएँ
• पुस्तक आदि"] & C["निक्षेप (रखना)
4 भेद

• अप्रत्यवेक्षित
(बिना देखे)

• दुःप्रमृष्ट
(बिना प्रमार्जित)

• सहसा
(भय, शीघ्रता के कारण)

• अनाभोग
(उपयोग रहित कहीं भी)"] & D["संयोग (मिलाना)
2 भेद

• भक्तपान
(विरुद्ध अन्न, जल आदि)

• उपकरण
(शीत या उष्ण, शुद्ध या अशुद्ध से स्पर्श करना)"] & E["निसर्ग (प्रवर्तना)
3 भेद

• काय
(शरीर से कुचेष्टा आदि)

• वचन
(दुष्ट शब्दों का उच्चारण)

• मन
(मन में दुष्ट विचार आदि)"]

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: निक्षेप चार प्रकार के होते हैं-  (१) अप्रत्यवेक्षित निक्षेप (२) दुःप्रमृष्ट निक्षेप। (३) सहसा निक्षेप (४) अनाभोग निक्षेप।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर: अप्रत्यवेक्षित निक्षेप– बिना देखी-शोधी भूमि में वस्तु को रख देना अप्रत्यवेक्षित निक्षेप है। साफ करने पर जीव है अथवा नहीं है, यह देखे बिना उपकरणादि रखना अप्रत्यवेक्षित निक्षेप है। दुःप्रमृष्ट निक्षेप– दुष्टता पूर्वक साफ की हुई भूमि में किसी वस्तु को रखना दुःप्रमृष्ट निक्षेप है। उपकरण आदि को असावधानता या दुष्टता से साफ करके रखना अथवा जिस स्थान पर उन्हें रखना है उस स्थान की दुष्टता से सफाई करना, जिससे जीवों को कष्ट पहुँचे दुःप्रमृष्ट निक्षेपाधिकरण है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 02 March 2026.

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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