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Acharya Shri Umaswati
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सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजक – दर्शन-मोहक्षपकोपशमकोपशान्त- मोहक्षपक-क्षीणमोहजिना : क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः ॥४५॥
सूत्रार्थ– सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत, अनन्तानुबन्धिवियोगज, दर्शनमोह क्षपक, उपशमक, उपशान्तमोह, क्षपक, क्षीणमोह और जिन – ये क्रम से असंख्यातगुण निर्जरा वाले होते हैं ।।४५।।


भावार्थ

अर्थ : सम्यग्दृष्टि, पंचम गुणस्थान वर्ती श्रावक, महाव्रती मुनि, अनन्तानुबन्धी का विसंयोजन करने वाले, दर्शन मोह का क्षय करने वाले, चारित्र मोह का उपशम करने वाले, उपशांत मोह यानी ग्यारहवें गुणस्थान वाले, क्षपक श्रेणी चढ़ने वाले, क्षीण-मोह यानी बारहवें गुण स्थान वाले और जिन भगवान के परिणामों की विशुद्धता अधिक अधिक होने से प्रति समय क्रम से असंख्यात गुणी, असंख्यात गुणी निर्जरा होती है।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The dissociation (nirjarā) of karmas increases innumerable-fold in each of these ten stages: samyagdṛṣṭi, śravaka, virata, anantānubandhiviyojaka, darsanmohakṣapaka, upaśamaka, upaśāntamoha, kṣapaka, kṣinamoha, and Jina (kevalī, the Victor).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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गुणश्रेणी निर्जरा में विशेषता के 10 स्थान(एक ही जीव की अपेक्षा)
स्थानस्वरूपस्वामी (गुणस्थान
अपेक्षा)
निर्जरा
सातिशय मिथ्यादृष्टिप्रथमोपशम सम्यक्त्व के पहले
करण लब्धि में
11-4 आगे-2
के स्थान
में
असंख्यात
गुणी
निर्जरा
होती है।


5-10 सामान्य
से
सबका
अंतर्मुहूर्त
काल
होने पर
भी
आगे-2
संख्यात
गुणाहीन
काल है।
1. सम्यग्दृष्टिअवधी ज्ञापक4
2. श्रावकव्रती श्रावक5
3. विरतमुनि7
4. अनंतानुबंधी
वियोजक
अनंतानुबंधी को अप्रत्याख्यानावरण
आदि रूप विसंयोजित करने वाला
4-7
5. दर्शनमोह क्षपकदर्शनमोह का क्षय करनेवाला4-7
6. उपशामकचारित्र मोह दबाने वालाउपशमश्रेणी
8-10
7. उपशांत कषायचारित्र मोह दबने पर11
8. क्षपकचारित्र मोह क्षय करने वालाक्षपकश्रेणी
8-10
9. क्षीण मोहचारित्र मोह क्षय होने पर12
10. सयोगी जिनघातिया कर्मों का क्षय करने के
बाद योग सहित
13

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: परिषहों पर विजय और अन्तरंग – बहिरंग तपश्चरण करने से कर्मों की निर्जरा होती है, ऐसा कहा है, परन्तु यह नहीं जाना गया कि सब सम्यग्दृष्टियों के निर्जरा समान होती है कि उनमें कुछ विशेषता ? ऐसी शंका होने पर आचार्य ने उत्तर रूप में यह सूत्र कहा है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : काललब्धि आदि की सहायता से जो परिणामों की विशुद्धि द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो रहा है ऐसा भव्य पंचेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्तक जीव क्रम से अपूर्वकरण आदि सोपान – पंक्ति पर चढ़ता हुआ बहुतर कर्मों की निर्जरा करने वाला होता है। वही प्रथम सम्यक्त्व की प्राप्ति के निमित्त मिलने पर सम्यग्दृष्टि होता हुआ असंख्येय गुण कर्मनिर्जरा वाला होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 12-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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