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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
सम्यग्दृष्टिश्रावकविरतानन्तवियोजक – दर्शन-मोहक्षपकोपशमकोपशान्त- मोहक्षपक-क्षीणमोहजिना : क्रमशोऽसंख्येयगुणनिर्जराः ॥ ४५ ॥
Meaning
सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत, अनन्तानुबन्धी का विसंयोजक, दर्शन मोह का क्षपक, चारित्र मोह का उपशमक, उपशान्त मोह, चारित्र मोह का क्षपक, क्षीणमोह और जिन ये क्रमशः असंख्यात गुणी- असंख्यात गुणी कर्मों की निर्जरा करने वाले हैं॥ ४५ ॥

भावार्थ

जब मिथ्यादृष्टि जीव प्रथमोपशम सम्यकत्व को प्राप्त करने के लिए तीन करण करता है उस समय उसके आयु कर्म के सिवा शेष सात कर्मों की बहुत निर्जरा होती है। वह जब सम्यग्दृष्टि हो जाता है तो उसके पहले से भी असंख्यात गुनी निर्जरा होती है। वह जब श्रावक हो जाता है तो उसके सम्यग्दृष्टि से भी असंख्यात गुनी निर्जरा होती है। श्रावक से जब वह सप्तम गुण स्थानवर्ती मुनि हो जाता है तो उसके श्रावक से भी असंख्यात गुनी निर्जरा होती है। जब वह मुनि होकर अनन्तानुबंधी कषाय को शेष कषाय रूप परिणमा कर उसका विसंयोजन करता है तो उसके मुनि से भी असंख्यात गुनी निर्जरा होती है। उसके बाद जब वह दर्शन मोहनीय कर्म का क्षय करता है तो उसके विसंयोजन काल से भी असंख्यात गुनी निर्जरा होती है। जब वह उपशम श्रेणी चढ़ता है तो उसके दर्शन मोह क्षपक से भी असंख्यात गुनी निर्जरा होती है। उसके बाद जब वह समस्त मोहनीय कर्म का उपशम करके उपशांत कषाय गुन स्थान वाला हो जाता है तो उसके उपशम अवस्था से भी असंख्यात गुनी निर्जरा होती है । वही जीव जब उपशम श्रेणी से गिरने के बाद क्षपक श्रेणी पर चढ़ता है तो उसके ग्यारहवें गुण स्थान से भी असंख्यात गुनी निर्जरा होती है। वही जब समस्त मोहनीय कर्म का क्षय करके क्षीण कषाय हो जाता है तो उसके क्षपक अवस्था से भी असंख्यात गुनी निर्जरा होती है । वही जब समस्त घातिया कर्मों को नष्ट करके केवली हो जाता है तो उसके क्षीण कषाय से भी असंख्यात गुनी निर्जरा होती है। सारांश यह है कि इन दस स्थानों को प्राप्त होने वाले जीवों के परिणाम उत्तरोत्तर अधिक अधिक विशुद्ध होते हैं अतः इनके कर्मों की निर्जरा भी असंख्यात गुनी होती है। इतना ही नहीं, जहाँ उत्तरोत्तर निर्जरा असंख्यात गुनी असंख्यात गुनी होती जाती है वहाँ निर्जरा का काल असंख्यातवें भाग, असंख्यातवें भाग घटता जाता है। जैसे जिन भगवान के निर्जरा का काल सबसे कम है उससे संख्यात गुना काल क्षीण कषाय का है। इस तरह यद्यपि निर्जरा ST का सातिशय मिथ्यादृष्टि तक अधिक अधिक होता है, किन्तु सामान्य से प्रत्येक का निर्जरा काल अन्तर्मुहूर्त ही है। इस उत्तरोत्तर कम कम काल में कर्मों की निर्जरा उत्तरोत्तर अधिक अधिक होती है॥ ४५ ॥ Reference:Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष Link to book

English Meaning:

The dissociation (nirjarā) of karmas increases innumerable-fold in each of these ten stages: samyagdṛṣṭi, śravaka, virata, anantānubandhiviyojaka, darsanmohakṣapaka, upaśamaka, upaśāntamoha, kṣapaka, kṣinamoha, and Jina (kevalī, the Victor). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


गुणश्रेणी निर्जरा में विशेषता के 10 स्थान

(एक ही जीव की अपेक्षा)

स्थानस्वरूपस्वामी (गुणस्थान
अपेक्षा)
निर्जरा
सातिशय मिथ्यादृष्टिप्रथमोपशम सम्यक्त्व के पहले
करण लब्धि में
11-4 आगे-2
के स्थान
में
असंख्यात
गुणी
निर्जरा
होती है।


5-10 सामान्य
से
सबका
अंतर्मुहूर्त
काल
होने पर
भी
आगे-2
संख्यात
गुणाहीन
काल है।
1. सम्यग्दृष्टिअवधी ज्ञापक4
2. श्रावकव्रती श्रावक5
3. विरतमुनि7
4. अनंतानुबंधी
वियोजक
अनंतानुबंधी को अप्रत्याख्यानावरण
आदि रूप विसंयोजित करने वाला
4-7
5. दर्शनमोह क्षपकदर्शनमोह का क्षय करनेवाला4-7
6. उपशामकचारित्र मोह दबाने वालाउपशमश्रेणी
8-10
7. उपशांत कषायचारित्र मोह दबने पर11
8. क्षपकचारित्र मोह क्षय करने वालाक्षपकश्रेणी
8-10
9. क्षीण मोहचारित्र मोह क्षय होने पर12
10. सयोगी जिनघातिया कर्मों का क्षय करने के
बाद योग सहित
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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer परिषहों पर विजय और अन्तरंग – बहिरंग तपश्चरण करने से कर्मों की निर्जरा होती है, ऐसा कहा है, परन्तु यह नहीं जाना गया कि सब सम्यग्दृष्टियों के निर्जरा समान होती है कि उनमें कुछ विशेषता ? ऐसी शंका होने पर आचार्य ने उत्तर रूप में यह सूत्र कहा है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer  काललब्धि आदि की सहायता से जो परिणामों की विशुद्धि द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो रहा है ऐसा भव्य पंचेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्तक जीव क्रम से अपूर्वकरण आदि सोपान – पंक्ति पर चढ़ता हुआ बहुतर कर्मों की निर्जरा करने वाला होता है। वही प्रथम सम्यक्त्व की प्राप्ति के निमित्त मिलने पर सम्यग्दृष्टि होता हुआ असंख्येय गुण कर्मनिर्जरा वाला होता है
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 12-Mar-2026

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