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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
उत्तमक्षमामार्दवार्जवशौचसत्यसंयमतपस्त्यागाकिञ्चन्य-
ब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥६॥
Meaning
उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य – ये दस धर्म हैं ॥६॥

भावार्थ

उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य ये दस धर्म के भेद हैं। क्रोध की उत्पत्ति के निमित्त होते हुए भी परिणामों में मलिनता न होना क्षमा है । उत्तम जाति, कुल, रूप, ज्ञान, ऐश्वर्य वगैरह के होते हुए भी उनका घमंड नहीं करना मार्दव है। मन, वचन और काय की कुटिलता का न होना आर्जव है। लोभ का अत्यंत अभाव शौच है। लोभ चार प्रकार का होता है जीवन का लोभ, निरोगता का लोभ, इंद्रियों का लोभ और भोग्य सामग्री का लोभ । इन चारों ही लोभों का अभाव होना शौच धर्म है। सज्जन पुरुषों के बीच में सुंदर वचन बोलना सत्य धर्म है। Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Supreme forbearance – uttama kṣamā, supreme modesty — uttama mārdava, supreme straightforwardness – uttama ārjava, supreme purity – uttama śauca, supreme truthfulness – uttama satya, supreme self-restraint uttama samyama, supreme austerity – uttama tapa, supreme renunciation – uttama tyāga, supreme non- attachment – uttama ākiñcanya, and supreme celibacy – uttama brahmacarya, constitute ten virtues (dharma). Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


धर्म
धर्म
नाम स्वरूप
1. उत्तम क्षमा
2. उत्तम मार्दव
3. उत्तम आर्जव
4. उत्तम शौच
क्रोध
मान
माया
लोभ    का अभाव
5. उत्तम सत्य सज्जन पुरुषों के साथ साधु वचन बोलना
6. उत्तम संयम प्राणियों की हिंसा व इन्द्रिय विषयों का परिहार
7. उत्तम तप कर्मक्षय के लिए जो तप किया जाता है
8. उत्तम त्याग संयत के योग्य ज्ञानादि का दान
9. उत्तम आकिन्चन्य शरीरादि में ममकार का त्याग
10. उत्तम ब्रह्मचर्य मन, वचन, काय से समस्त स्त्रियों का त्याग

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer चारित्र ही धर्म है जो धर्म है सो साम्य है और साम्य मोह क्षोभ रहित आत्मा के परिणाम हैं।  समता, माध्यस्थता, शुद्ध भाव, वीतराग, चारित्र, धर्म, स्वभाव की आराधना ये सब एकार्थवाची शब्द हैं। रागादि समस्त दोषों से रहित होकर आत्मा का जो भाव है, वह धर्म है। रागादि दोषों से रहित तथा शुद्धात्मा की अनुभूति सहित निश्चय धर्म होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer पंच परमेष्ठि आदि की भक्ति परिणाम रूप व्यवहार धर्म होता है। आहार दान आदिक ही ग्रहस्थों का परमधर्म है। सम्यक्त्व पूर्वक किये गये उसी धर्म से परम्परा मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। साधुओं की अपेक्षा षड़ावश्यक लक्षण वाले तथा गृहस्थों की अपेक्षा दान-पूजादि लक्षण वाले शुभोपयोग रूप व्यवहार धर्म में रति करो ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 9-Mar-2026

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