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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्यास्रवसंवरनिर्जरालोकबोधिदुर्लभधर्म स्वाख्यातत्वानुचिन्तनमनुप्रेक्षाः ॥७॥
Meaning
अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्मस्वाख्यातत्व का बार-बार चिन्तन
करना अनुप्रेक्षाएँ हैं॥७॥

भावार्थ

अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधि दुर्लभ, धमस्वाख्यात इन बारहों के स्वरूप को बार बार चिन्तन करना अनुप्रेक्षा है। इंद्रियों के विषय, धन, यौवन, जीवन वगैरह जल के बुलबुले के समान क्षणभंगुर हैं ऐसा विचारना अनित्यानुप्रेक्षा है। ऐसा विचारते रहने से इनका वियोग होने पर भी दुःख नहीं होता ।। १ ।। इस संसार में कोई शरण नहीं है। पाल पोषकर पुष्ट हुआ शरीर भी कष्ट में साथ नहीं देता, बल्कि उल्टा कष्ट का ही कारण होता है। बंधु बांधव भी मृत्यु से नहीं बचा सकते। इस प्रकार का विचार करना अशरणानुप्रेक्षा है ||२॥ संसार के स्वभाव का विचार करना संसारानुप्रेक्षा है ॥ ३ ॥ संसार में मैं अनादि काल से अकेला ही घूमता हूँ। न कोई मेरा अपना है और न कोई पराया । धर्म ही एक मेरा सहायक है। ऐसा विचारना एकत्वानुप्रेक्षा है ||४ | शरीर वगैरह से अपने को भिन्न विचारना अन्यत्वानुप्रेक्षा है ॥ ५ ॥ शरीर की अपवित्रता का विचार करना अशुचित्वानुप्रेक्षा है ॥ ६ ॥ आस्रव के दोषों का विचार करना आसवानुप्रेक्षा है ॥ ७ ॥ संवर के गुणों का विचार करना संवरानुप्रेक्षा है ॥ ८ ॥ निर्जरा के गुण दोषों का विचार करना निर्जरानुप्रेक्षा है॥९॥ लोक के आकार वगैरह का विचार करना लोकानुप्रेक्षा है। इसका विचार करने से ज्ञान की विशुद्धि होती है ॥ १० ॥ ज्ञान की प्राप्ति हेतु दुर्लभ है अतः ज्ञान को पाकर विषय सुख में नहीं डूबना चाहिए इत्यादि विचारना बोद्धि दुर्लभ अनुप्रेक्षा है ॥ ११ ॥ अर्हन्त भगवान के द्वारा कहा गया धर्म मोक्ष की प्राप्ति का कारण है, इत्यादि विचार करना धर्मानुप्रेक्षा है || १२ || इन बारह अनुप्रेक्षाओं की भावना करने से मनुष्य उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों को भी अच्छी रीति से पालता है और आगे कही जाने वाली परिषों को भी जीतने का उत्साह करता है। इसी से अनुप्रेक्षाओं को धर्म और परिषहोंके बीच में रखा है ॥७॥Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

Deep reflections – anuprekṣā – are meditating again and again on transitoriness – anitya, helplessness – aśarana, transmigration – samsāra, solitariness – ekatva, distinctness – anyatva, impurity – aśuci, influx – āsrava, stoppage – samvara, dissociation- nirjarā, the universe – loka, rarity of enlightenment – bodhidurlabha, and the truth proclaimed by religion – dharmasvākhyātatva. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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अनुप्रेक्षा (भावना) – बारम्बार चिंतन करना
अनुप्रेक्षा (भावना) – बारम्बार चिंतन करना
वैराग्य प्रेरक 6 भावनाएँ
नाम संयोगों संबंधी चिंतन आत्मा संबंधी चिंतन
1. अनित्य क्षणभंगुरता नित्यता – स्थायित्व
2. अशरण अशरणता शरणभूतत्व
3. संसार निरर्थकता सार्थकता
4. एकत्व निःसंगता संगता
5. अन्यत्व पृथकता एकता
6. अशुचि अपवित्रता पवित्रता
तत्त्व प्रधान 6 भावनाएँ
नाम किनका चिंतन?
7. आस्रव विकारी संयोगी भावों का
8. संवर संवर के गुणों का
9. निर्जरा निर्जरा के गुणों का
10. लोक लोक के स्वभाव का
11. बोधिदुर्लभ रत्नत्रय की दुर्लभता का
12. धर्म मोक्ष प्राप्ति के उपाय का
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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer ये समुदाय रूप शरीर, इन्द्रिय विषय, उपभोग और परिभोग द्रव्य जल के बुलबुले के समान अनवस्थित स्वभाव वाले हैं तथा गर्भादि अवस्था विशेषों में सदा प्राप्त होने वाले संयोगों से विपरीत स्वभाव वाले हैं, मोहवश अज्ञ प्राणी इनमें नित्यता का अनुभव करता है। पर वस्तुतः आत्मा के ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग स्वभाव के सिवा इस संसार में अन्य कोई पदार्थ ध्रुव नहीं है । इस प्रकार चिन्तन करना अनित्यानुप्रेक्षा है। जब जीव के साथ क्षीरनीरवत् निबद्ध यह शरीर शीघ्र नष्ट हो जाता है, तो भोगोपभोग के कारण ये दूसरे पदार्थ किस तरह नित्य हो सकते हैं?  यह शरीर, आयु, सुख, राज्य, भवन और धन आदि अनित्य हैं और इन्द्रधनुष के समान क्षणभंगुर हैं, यौवन बुढ़ापे से घिरा हुआ है, आयु यमराज के मुख में ही रह रही है, भोग रोगों से मिले हुए हैं, सुखों के आगे सदा दु:ख ही बने रहते हैं । इन्द्र, चक्रवर्ती, बलदेव आदि के जितने उत्तम पद हैं वे भी सदा रहने वाले नहीं हैं, इन्द्रिय आरोग्य, सामर्थ्य और बल बादल के समान थोड़ी देर रहने वाले हैं। चंचल स्त्रियाँ सांकल के समान बाँधने वाली हैं, घर कारावास के समान है, रूप क्षणभंगुर है, जीवन बिजली के समान चंचल है, सम्पत्तियाँ विपत्तियों के साथ रहती हैं, इस प्रकार समस्त पदार्थ क्षणभंगुर हैं। यह पापी यमराज समय-समय के अनुसार थोड़ा-थोड़ा चलकर जन्म पर्यन्त सवेरे से शाम तक अनेक जीवों को अपने पास बुला लेता है। संसार के सभी सुन्दर पदार्थ काल रूपी अग्नि में भस्म हो जाते हैं, इस प्रकार चिन्तन करना अनित्य भावना है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer अनित्य भावना का चिन्तन करने वाले प्राणी के इन सांसारिक पदार्थों में आसक्ति का अभाव होने से भोग कर छोड़ी हुई माला, गन्ध आदि के समान इन पदार्थों के वियोग काल में मानसिक ताप नहीं होता है। यह संसार अनित्य है, इसमें किसी की रक्षा नहीं है, जन्म, मरण रूपी महारोग से युक्त है तथा मैं पहले, मैं पहले करके मिथ्यात्व रूप पदार्थों से घिरा हुआ है। ऐसा विचार कर निर्मल बुद्धि वाले धर्मात्मा सन्त पुरुष उस संसार से छूटने के लिए निष्पाप जैन तप करने में प्रवृत्त हुए हैं। संसार का समस्त सुख बिजली के समान चंचल और तृष्णा के समूह को एकत्र करने में दक्ष है, तृष्णा बढ़ने से संताप होता है, वह संत आग की तरह मन को जलाता है। उससे प्राणियों को अत्यन्त खेद होता है, ऐसा मन में विचार कर विद्वज्जन पवित्र जैन धर्म में लीन होते हैं। ऐसी भावना वाले पुरुष के उन पदार्थों का वियोग होने पर भी जूठे भोजन के समान दुख नहीं होता। उनमें ममत्व का अभाव होने से अविनाशी निज परमात्मा को ही भेद, अभेद रूप रत्नत्रय की भावना द्वारा भाता है जैसी अविनश्वर आत्मा को भाता है वैसी ही अक्षय अनन्त सुख स्वभाव वाली मुक्त आत्मा को प्राप्त कर लेता है।Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 9-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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