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Acharya Shri Umaswati
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आस्रवनिरोधः संवरः ॥१॥
सूत्रार्थ– आस्रव का निरोध संवर है ॥१॥




भावार्थ

अर्थ : नए कर्मों के आने में जो कारण है उसे आस्रव कहते हैं और आस्रव के रोकने को संवर कहते हैं। संवर के दो भेद हैं-भाव संवर और द्रव्य संवर।
जो क्रियाएँ संसार में भटकने के हेतु हैं उन क्रियाओं का अभाव होना भाव संवर है और उन क्रियाओं का अभाव होने पर क्रियाओं के निमित्त से जो कर्म पुद्गलों का आगमन होता था उनका रुकना द्रव्य संवर है ॥१॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The obstruction (nirodha) of influx (āsrava) is stoppage (samvara).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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संवर (आस्रव का रुकना)
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flowchart TB
    A["संवर (आस्रव का रुकना)"] --> B["द्रव्य"] & C["भाव"]
    B --> B1["कर्मों का आना रुकना"]
    C --> C1["संसार के निमित्तभूत परिणामों की निवृत्ति"]

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गुणस्थान
गुणस्थान का नामस्वरूप
1. मिथ्यात्वजिसमें मिथ्यादर्शन पाया जाता है।
2. सासादन सम्यग्दृष्टिसम्यक्त्व से च्युत होकर भी मिथ्यात्व को प्राप्त नहीं हुआ। दृष्टी अनुभव रूप है।
3. सम्यग्मिथ्यादृष्टीजिसकी दृष्टी सम्यक्त्व व मिथ्यात्व उभयरूप हैं।
4. अविरत सम्यग्दृष्टिसम्यक्त्व होकर जो अविरत है।
5. देशविरत (व्रती श्रावक)स्थावर हिंसा से विरत न होकर भी त्रस हिंसा से विरत है।
6. प्रमत्तसंयत (मुनी)प्रमाद सहित संयमभाव पाया जाता है।
7. अप्रमत्तसंयतप्रमाद रहित संयमभाव पाया जाता है।
8. अपूर्वकरणजहाँ पहले नहीं प्राप्त हुए, ऐसे परिणाम (करण) प्राप्त होते हैं।
9. अनिवृत्तिकरणजहाँ एक समय वालों के परिणामों में भेद नहीं होता।
10. सूक्ष्म लोभजहाँ सिर्फ लोभ कषाय अत्यन्त सूक्ष्म रह जाती है।
11. उपशान्त मोहजहाँ सम्पूर्ण मोह द्ब जाती है।
12. क्षीणमोहजहाँ सम्पूर्ण मोह का क्षय हो जाता है।
13. सयोगी केवली (अरहन्त)जहाँ केवलज्ञान के साथ योग पाया जाता है।
14. अयोग केवलिजहाँ केवलज्ञान के साथ योग का अभाव है।
15. गुणस्थानातील (सिद्ध)जहाँ द्रव्यकर्म, भावकर्म, नोकर्म, तीनों का अभाव है।

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: कर्मों के आगमन के निमित्तों का अप्रादुर्भाव ही आस्रवनिरोध है। बहुत विकल्पों वाले कर्मागम के निमित्तों का वर्णन पूर्व में किया है। उन कर्मागम के निमित्तभूत मन, वचन और काय के प्रयोग का स्वात्मलाभ हेतु से सहित्यान से उत्पन्न नहीं होना आस्रव निरोध है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : दर्शनमोहनीय आदि कर्मों की उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम आदि अवस्था के होने पर होने वाले जिन परिणामों से युक्त जो जीव देखे जाते हैं उन जीवों को सर्वज्ञदेव से उसी गुणस्थान वाला और उन परिणामों को गुणस्थान कहा है। संक्षेप और ओघ यह गुणस्थान की संज्ञा है और वह मोह तथा योग के निमित्त से उत्पन्न होती है। गुणस्थान की सामान्य संज्ञा भी समझना चाहिए।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 8-Mar-2026

Courtesy:
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