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Acharya Shri Umaswati
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सूक्ष्मसाम्परायछद्मस्थवीतरागयोश्चतुर्दश ।।१०।।
सूत्रार्थ– सूक्ष्मसाम्पराय और छद्मस्थवीतराग के चौदह परीषह सम्भव हैं ।।१०।।


भावार्थ

अर्थ : सूक्ष्मसाम्पराय नाम के दसवें गुणस्थान में और छद्मस्थ वीतराग यानी ग्यारहवें और बारहवें गुणस्थान में क्षुधा, पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, अलाभ, रोग, तृण स्पर्श, मन्न प्रज्ञा और अज्ञान ये चौदह परीषह होती हैं। मोहनीय कर्म के उदय से होने वाली आठ परिषह नहीं होती, क्योंकि ग्यारहवें और बारहवें गुणस्थान में मोहनीय कर्म का उदय ही नहीं है। दसवें में केवल लोभ संज्वलन कषाय का उदय है। वह भी अत्यंत सूक्ष्म है अतः दसवाँ गुणस्थान भी वीतराग छद्मस्थ के ही तुल्य है। इसलिए उसमें भी मोहजन्य आठ परिषह नहीं होती ॥१०॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

Fourteen afflictions (parisaha) are possible in case of the saints in the tenth – suksmasamparaya – and the eleventh/twelfth – chadmastha vītaraga – stages.
Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: शिष्य पूछता है कि परीषहों को जीतने से संवर होता है, ऐसा आपने कहा है, अब यह बताइये कि संसार समुद्र से तिरने की इच्छा रखने वाले इन मुनिगण को क्या वे सभी परीषह एक साथ दुःख देते हैं कि इनमें कुछ विशेषता है? विशेषता यह है कि भिन्न-भिन्न चारित्रों के अनुसार ये विभक्त हो जाते हैं। इन दोनों (सूक्ष्मसाम्पराय एवं वीतराग छद्मस्थ) में नियम से जानने योग्य विशेषताओं को इस सूत्र के द्वारा बताया गया है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : ‘चतुर्दश’ पद से अन्य परीषहों का अभाव जानना चाहिए क्योंकि चतुर्दश इस संख्या विशेष का ग्रहण नियम के लिए है कि चौदह ही होती हैं अन्य नहीं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



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Diksha Jain created this page on 9-Mar-2026

Courtesy:
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