
Acharya Shri Umaswati
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ईर्याभाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः ॥५॥
सूत्रार्थ – ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेपण और उत्सर्ग- ये पाँच समितियाँ हैं ।।५।।
भावार्थ
अर्थ : ईर्या, भाषा, एषणा, आदान निक्षेपण और उत्सर्ग ये पाँच समितियाँ हैं। यहाँ पूर्व सूत्र से ‘सम्यक्’ पद की अनुवृत्ति होती है। अतः पाँचों में सम्यक् पद लगा लेना चाहिए। अर्थात् सम्यक् ईर्या, सम्यक् भाषा, सम्यक् एषणा, सम्यक् आदान निक्षेप और सम्यक् उत्सर्ग। जिस के उदय से जाते समय जब प्रकाश हुआ हो उस जीव के प्रति जो प्रत्येक वस्तु साफ दिखाई देने लगे, उस समय मनुष्य के पद संचालन से जो मार्ग प्राप्य हो उस मार्ग पर चार हाथ जमीन आगे देखते हुए धूप और तेज गर्मी से मन को रोककर धीरे-धीरे गमन करना ईर्या समिति है। हिंसारहित हित और मित वचन कहना भाषा समिति है अर्थात् मिथ्या वचन, निन्दाकर वचन, अप्रिय वचन, कपट के वचन, भेद डालने वाले वचन, निस्सार अथवा अल्प सार वाले वचन, स्नेह से भरे हुए वचन, भ्रम पैदा करने वाले वचन, हिंसा वचन, अपहृत वचन, असत्य वचन, कठोर वचन, अभक्ष्यक वचन और अतिशयता युक्त वचन साधु को नहीं बोलना चाहिए। जिस में एक बार श्रावक के घर जाकर नवधाभक्तिपूर्वक तथा कृत, कारित, अनुमोदना आदि दोषों से रहित दिया हुआ निर्दोष आहार खड़े होकर अपने पात्र में ग्रहण करना एषणा समिति है। शास्त्र कमंडल आदि हाथ के उपकरणों को देख भालकर तथा पीठी से साफ करते रहना, उठाना, आदान निक्षेपण समिति है। सब ओर स्थावर जीवों को जिससे बाधा न पहुँचे इस तरह से शुद्ध जंतु रहित भूमि में मल मूत्र आदि करना उत्सर्ग समिति है। इस तरह ये पाँचों समितियाँ संवर की कारण हैं।
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf
English Meaning:
The fivefold regulation of activities – samiti – pertain to walking – irya, speaking – bhasa, eating – esana, lifting and laying down – adananiksepa, and depositing waste products – utsarga.
Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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समिति
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A["समिति"] --> B["ईर्या<br>• 4 हाथ आगे की<br>जमीन देखकर चलना"] & C["भाषा<br>• हित-मित<br>प्रिय वचन बोलना"] & D["एषणा<br>• दिन में 1 बार<br>निर्दोष आहार लेना"] & E["आदान-निक्षेपण<br>• उपकरणों को<br>देख-भाल कर<br>लेना व रखना"] & F["उत्सर्ग<br>• जन्तुरहित स्थान पर<br>मल-मूत्र आदि का<br>त्याग करना"]
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Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: व्यवहार से ईर्ष्या समिति आदि पाँच समितियों के द्वारा सम्यक् प्रकार ‘इत:’ अर्थात् प्रवृत्ति करना सो समिति है। व्यवहार से उस निश्चय समिति के बहिरंग सहकारी कारणभूत आचार चारित्र विषयक ग्रन्थों में कही हुई समिति है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
उत्तर : निश्चय नय की अपेक्षा अनन्त ज्ञानादि स्वभाव धारक निज आत्मा है, उसमें ‘सम’ भले प्रकार अर्थात् समस्त रागादि भावों के त्याग द्वारा आत्मा में लीन होना, आत्मा का चिन्तन करना, तन्मय होना आदि रूप से जो अयण (गमन) अर्थात् परिणमन है सो समिति है । निश्चय से तो अपने स्वरूप में सम्यक् प्रकार से गमन, परिणमन समिति है। अभेद अनुपचार रत्नत्रय रूपी मार्गपर परमधर्मी ऐसे आत्मा के प्रति सम्यग् ‘इति’ परिणति वह समिति है, अथवा निज परम तत्त्व में लीन सहज परम ज्ञानादिक के परम धर्मों की संहति (मिलन, संगठन) वह समिति है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 9-Mar-2026
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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