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Acharya Shri Umaswati
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अतोऽन्यत्पापम् ॥२६॥
सूत्रार्थ– इनके सिवा शेष सब प्रकृतियाँ पापरूप हैं ॥२६॥




भावार्थ

अर्थ : इन पुण्य कर्म प्रकृतियों के सिवा शेष कर्म प्रकृतियाँ पाप प्रकृतियाँ हैं। सो ज्ञानावरण की पाँच, दर्शनावरण की नौ, मोहनीय की छब्बीस, अन्तराय की पाँच, ये घातिया कर्मों की प्रकृतियाँ पाप प्रकृतियाँ हैं। नरक गति, तिर्यंच गति, एकेन्द्रिय आदि, चार जातियाँ, पाँच संस्थान, पाँच संहनन, अप्रशस्त वर्ण गंध रस स्पर्श, नरक गत्यानुपूर्वी, उपघात, अप्रशस्त विवाहोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, गत्यनुपूर्वी, साधारण शरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशःकीर्ति ये नाम कर्म की चौतीस प्रकृतियाँ, असाता वेदनीय, नरकायु और नीच गोत्र। इस तरह बयासी प्रकृतियाँ पाप प्रकृतियाँ हैं। ॥२६॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The remaining varieties of karmas constitute demerit (pāpa).
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


पुण्य-पाप प्रकृति विभाजन
पुण्यपापकुल
अनुभाग अपेक्षा68100168
स्थिति अपेक्षा3 (3 आयु)145148
कुल कर्म प्रकृति:148 + 20 = 168(वर्णादि प्रशस्त व अप्रशस्त दोनों होते हैं)

पुण्य-पाप प्रकृति विभाजन
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  themeVariables:
    background: '#ffffff'
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flowchart LR
    A["घातिया कर्म"] --> B["सर्वघाती (जो अनुजीवी गुणों को पूरे तौर से घाते) (21)"] & C["देशघाती (जो अनुजीवी गुणों को एकदेश घाते) (26)"]
    B --> B1["ज्ञानावरण (1)"] & B2["दर्शनावरण (6)"] & B3["मोहनीय (14)"]
    B1 --> B1a["केवलज्ञानावरण"]
    B2 --> B2a["केवलदर्शनावरण"] & B2b["5 निद्राएँ"]
    B3 --> B3a["मिथ्यात्व"] & B3b["मिश्र"] & B3c["12 कषाय"]
    C --> C1["ज्ञानावरण (4)"] & C2["दर्शनावरण (3)"] & C3["मोहनीय (14)"] & C4["अंतराय (5)"]
    C1 --> C1a["केवलज्ञानावरण के अलावा शेष चार"]
    C2 --> C2a["चक्षुदर्शनावरण"] & C2b["अचक्षुदर्शनावरण"] & C2c["अवधिदर्शनावरण"]
    C3 --> C3a["सम्यक्त्व प्रकृति"] & C3b["4 संज्वलन कषाय"] & C3c["9 नोकषाय"]

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय इन कर्मों की घातिया संज्ञा है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनन्तवीर्य और क्षायिक सम्यक्त्व तथा ‘च’ शब्द से सूचित क्षायिक चारित्र और क्षायिक दान, लाभ, भोग, उपभोग रूप क्षायिक गुणों को, तथा प्रतिज्ञानादि क्षायोपशमिक गुणों को भी ये ज्ञानावरणादि कर्म घात करते हैं इसलिए इन्हें घातिया कर्म कहते हैं। केवलज्ञान, केवलदर्शन, सम्यक्त्व, चारित्र और वीर्य रूप जो अनेक भेद-मिश्रित जीवगुण हैं, उनके उक्त कर्म विरोधी होते हैं इसलिए वे घातिया कर्म कहलाते हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 8-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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