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Acharya Shri Umaswati
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ततश्च निर्जरा ॥२३॥
सूत्रार्थ– इसके बाद निर्जरा होती है ॥२३॥




भावार्थ

अर्थ : फल दे चुकने पर कर्म की निर्जरा हो जाती है; क्योंकि स्थिति पूरी हो चुकने पर कर्म आत्मा के साथ एक क्षण भी चिपटा नहीं रह सकता। आत्मा से छूटकर वह किसी और रूप से परिणमन कर जाता है। इसी का नाम निर्जरा है। ॥२३॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

After fruition (anubhava), the shedding – nirjarā – of karmas takes place.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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अनुभाग बंध
अनुभाग क्या?अनुभव- विविध प्रकार के फल देने की शक्ति का पड़ना
किस रूपअपने अपने नाम रूप
फल (उदय) देकर क्या होता है?निर्जरा (आत्मा से कर्मपने के संबंध का अभाव)

अनुभाग की प्रवृत्ति
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flowchart TB
    A["अनुभाग की प्रवृत्ति"] --> B["स्वमुख"] & C["परमुख"]
    B --> B1["अपने स्वभाव रूप से उदय में आना"]
    C --> C1["अन्य कर्मों के हेतु उदय में आना"] & C2["जैसे – असाता साता रूप उदय में आए"]

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निर्जरा
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    background: '#ffffff'
---
flowchart TB
    A["निर्जरा"] --> B["सविपाक"] & C["अविपाक / सकाम"] & D["अकाम"]
    B --> B1["कर्मों की स्थिति पूर्ण होने पर फल देकर झड़ना"]
    C --> C1["स्थिति अवधि पूर्ण हुए बिना तपादि द्वारा बीच में ही कर्मों की स्थिति घटना"]
    D --> D1["इच्छा बिना शुभ-अशुभ कार्यों से कर्म का क्षय"] & D2["यहाँ पाप की निर्जरा व पुण्य का बन्ध होता है"]

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: पूर्वापार्जित कर्म का झड़ जाना ही निर्जरा है। आत्मा को सुख वा दुःख देकर खाये हुए ओदनादि आहार के मल की तरह स्थिति के क्षय हो जाने के कारण अवस्थान का अभाव होने से पूर्वापार्जित कर्मों का झड़ जाना नष्ट हो जाना ही निर्जरा है। जिस प्रकार भात आदि का मल निवृत्त होकर निर्जीर्ण हो जाता है उसी प्रकार आत्मा को पीड़ा (दुःख) और अनुग्रह (सुख) रूप फल देकर पूर्व प्राप्त स्थिति का नाश हो जाने से स्थिति न रहने के कारण कर्म की निवृत्ति का होना निर्जरा है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : अबुद्धिपूर्वा- नरकादि गतियों में कर्मफल विपाक से होने वाली अबुद्धिपूर्वा निर्जरा है, वह अकुशलानुबन्धी है क्योंकि वह पापबन्ध का कारण है। कुशलपूर्वा- परीषहजय और तप आदि से होने वाली निर्जरा कुशलमूला है जो शुभ कर्म का बन्ध करती है या सर्वथा बन्धरहित होती है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 8-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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