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Acharya Shri Umaswati
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सप्ततिर्मोहनियस्य ॥१५॥
सूत्रार्थ– मोहनीय की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोटाकोटी सागरोपम है ॥१५॥




भावार्थ

अर्थ : मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोडाकोड़ी सागर प्रमाण है। यह उत्कृष्ट स्थिति भी सैनी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि जीव के ही होती है ॥१५॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

Seventy sāgaropama kotākoti is the maximum duration – utkrsta sthiti – of the deluding (mohanīya) karma.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: एकेन्द्रिय पर्याप्तक के मोहनीय कर्म का उत्कृष्ट स्थिति बन्ध एक सागर प्रमाण है। द्विन्द्रिय पर्याप्तक के पच्चीस सागर, त्रिन्द्रिय पर्याप्तकों के पचास सागर, चतुरिन्द्रिय पर्याप्तकों के सौ सागर, असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तकों के एक हजार सागर तथा संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तकों के सत्तर कोटा कोटी सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति बन्ध होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : जो प्राणी दूसरों के दान देने और पाने में बाधक होते हैं वे भव-भव में दरिद्र ही होते हैं। जो किसी को होते हुए लाभ में अकारण ही अड़ंगा लगा देते हैं उनकी सम्पत्ति कमाने की इच्छा असफल ही रहती है। अपने-अपने पुण्य के फलस्वरूप भोगों का रस लेने वालों के मार्ग में जो बाधक होते हैं वे स्वयं भी सब ही भोगों से वंचित रह जाते हैं। जिन्होंने दूसरों के उपभोग भोगने के मार्ग में रोड़े अटकाये हैं वे सम्पत्ति आदि साधनों को पाकर भी उपभोग के आनन्द से वंचित ही रह जाते हैं। दूसरों की शक्ति वीर्य के विकास मार्ग में जो काँटे बोते हैं वे भी इस संसार में शक्तिहीन और अक्षम होते हैं।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 8-Mar-2026

Courtesy:
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