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Acharya Shri Umaswati
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नारकतैर्यंग्योनमानुषदैवानि ॥१०॥
सूत्रार्थ– नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु- ये चार आयु हैं ॥१०॥




भावार्थ

अर्थ : नारक, तिर्यंच, मनुष्य और देव ये चार आयु कर्म के भेद हैं। जिसके उदय से नरक में दीर्घकाल तक रहना पड़े वह नरकायु है। जिसके उदय से तिर्यंच योनि में रहना पड़े वह तिर्यंचायु है। जिसके उदय से मनुष्य पर्याय में जन्म लेना पड़े वह मनुष्यायु है और जिसके उदय से देवों में जन्म हो वह देवायु है ॥१०॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf

English Meaning:

The life-determining (āyuh) karma has four subdivisions: life as an infernal being – narakāyuh, life as plant and animal – tiryańcāyuh, life as a human being – manusyāyuh and life as a celestial being – devāyuh.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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आयु
flowchart TB
    A["आयु"] --> B["नरकायु"] & C["तिर्यंचायु"] & D["मनुष्यायु"] & E["देवायु"]
    B --> B1["नारकी"]
    C --> C1["तिर्यंच"]
    D --> D1["मनुष्य"]
    E --> E1["देव"]
    B1 --> F["के शरीर में रोकते रखे"]
    C1 --> F
    D1 --> F
    E1 --> F

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Questions and Answers: शङ्का -समाधान

समाधान: नहीं, जीवन का मूल कारण आयु है, अन्नादि नहीं। क्योंकि अन्नादि आयु के अनुग्राहक (उपकार करने वाले) हैं। जैसे- घतादि की उत्पत्ति में मूलकारण मिट्टी का पिण्ड है और दण्डादि सहायक है। उसी प्रकार भवधारण का मूल कारण आयु है और अन्नादि उसके उपग्राहक हैं। देव-नारकीयों में अन्नादि का अभाव होने पर भी भव धारण होता है तथा अन्नादि के सन्निधान में भी क्षीण आयु वाले का मरण देखा जाता है, अन्नादि भव-धारण का मूल कारण नहीं है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

उत्तर : जिसके उदय से शारीरिक, मानसिक सुख स्वरूप देव पर्याय में जन्म होता है वह दैवायु है। वा जिस कर्म के उदय से प्रायः कर शारीरिक-मानसिक सुखों से युक्त देव पर्याय में जन्म होता है उसे दैवायु जानना चाहिए। जिस कर्मस्कंदधों के उदय से देव भव में अवस्थान होता है वह दैवायु है। दैवायु उत्पन्न करने वाले कर्म के उदय से प्राणी स्वर्ग में उत्पन्न होकर विलक्षण हैं प्रभाव जिसका और सुखामृत आस्वादन में आसक्त है चित्त जिसका ऐसा देव होकर स्वर्ग के सुख भोगता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 6-Mar-2026

Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project



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