
Acharya Shri Umaswati
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शेषाणामनन्तमुहूर्ताः ॥२०॥
सूत्रार्थ– बाकी के पाँच कर्मों की जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है ॥२०॥


भावार्थ
अर्थ : ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, आयु और अन्तराय कर्म की जघन्य स्थिती अन्तर्मुहूर्त है। इनमें से मोहनीय कर्म की जघन्य स्थिति नौंवें गुणस्थान में ही बंधती है। आयु की जघन्य स्थिति संख्यात वर्ष की आयु वाले कर्मभूमियाँ मनुष्य और तिर्यंचों के बँधती है। और शेष तीन कर्मों की जघन्य स्थिति सूक्ष्म साम्पराय गुणस्थान में बंधती है ॥२०॥
Reference: Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्रबाब्रप्रदीप_पियूष.pdf
English Meaning:
The minimum duration – jaghanya sthiti – of the remaining five kinds of karmas is up to one muhūrta.
Reference: Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain

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शेष जीवों का उत्कृष्ट कर्म स्थिति बंध
| जीव | मोहनीय | ज्ञानावरणादि ५ | नाम गोत्र | आयु |
|---|---|---|---|---|
| एकेन्द्रिय | 1 सागर | 3/7 सागर | 2/7 सागर | 1 कोटी पूर्व |
| द्वीन्द्रिय | 25 सागर | 25X3/7 सागर | 25X2/7 सागर | 1 कोटी पूर्व |
| त्रीन्द्रिय | 50 सागर | 50X3/7 सागर | 50X2/7 सागर | 1 कोटी पूर्व |
| चतुरेन्द्रिय | 100 सागर | 100X3/7 सागर | 100X2/7 सागर | 1 कोटी पूर्व |
| असैनी पंचेन्द्रिय | 1000 सागर | 1000X3/7 सागर | 1000X2/7 सागर | पल्य/असंख्यात |
उत्तर प्रकृति
| उत्तर प्रकृति | उत्कृष्ट स्थिति (कोड़ाकोड़ी सागर में) |
|---|---|
| नाम- संस्थान और संहनन हुंडक संस्थान, असम्प्राप्तासुपाटिक संहनन आगे- 2 एक-2 संस्थान व संहनन की 2 कोड़ाकोड़ी सागर कम- 2 होती जाती हैं | 20 |
| – आहारक शरीर, आहारक अंगोपांग, तीर्थंकर | अंतः |
| – देवगति व आनुपूर्वी, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर आदेय, यशःकीर्ति, प्रशस्त विहायोगति | 10 |
| – मनुष्य गति व आनुपूर्वी | 15 |
| – द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय व चतुरिन्द्रिय जाति, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण | 18 |
| – शेष 35 प्रकृतियाँ | 20 |
Questions and Answers: शङ्का -समाधान
समाधान: पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण (चक्षु-दर्शन, अचक्षु-दर्शन, अवधी-दर्शन और केवलदर्शन), लोभ संज्वलन और पाँचों अन्तराय, इन पन्द्रह कर्मों का जघन्य स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
उत्तर : पाँच ज्ञानावरण एवं चार दर्शनावरण कर्म तथा पाँच अन्तराय का जघन्य स्थिति बन्ध सूक्ष्म साम्पराय गुणस्थानवर्ती जीव के होता है तथा संज्वलन लोभ का जघन्य स्थितिबन्ध अनिवृत्ति करण गुणस्थान में होता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-२-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf
- Tatvarthsutra-in-Charts-&-Table-तत्वार्थसूत्र-_Smt-Pooja-Prakash-Chabda –Link
- Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain
- Tatvartha-Sutra-Pradeep-Bhaiya-Piyush-तत्वार्थसूत्र बा.ब्र.प्रदीप पियूष– Link to book
- TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री
- Tatvarth-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Acharya-Shri-Vasunandiji
- Tatvartha_Sutra_Muni_Sudhasagarji_तत्वार्थसूत्रमुनिसुधासागर_जी
- Tatwarth-Manjusha-Khand-1-तत्वार्थ-मंजूषा-खंड-१-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji
Creative Credits:
Shashank Shaha created this page on 8-Mar-2026
Courtesy:
We are thankful to Sandesh Shah and Family -Pune (Uptech Engg) for sponsoring Tatvarthasutra Digitalization project
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