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Acharya Shri Umaswati
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Sutra
विधि-द्रव्य-दातृ-पात्रविशेषात्तद्विशेषः ।। ३९ ।।
Meaning
विधि, देय वस्तु, दाता और पात्र की विशेषता से उसकी विशेषता है।। ३९ ।।

भावार्थ

 विधि द्रव्य, दाता और पात्र की विशेषता से दान में विशेषता होती है। आदर पूर्वक नवधा भक्ति से आहार देना विधि की विशेषता है। तप, स्वाध्याय आदि में जो सहायक हो ऐसा सात्विक आहार आदि देना द्रव्य की विशेषता है। किसी से ईर्ष्या न करना, देते हुए खेद न होना आदि दाता की विशेषता है और पात्र का विशिष्ट ज्ञानी, ध्यानी और तपस्वी होना, ये पात्र की विशेषता है। इन विशेषताओं से दान में विशेषता होती है। और दान में विशेषता होने से उसके फल में विशेषता होती है।। ३९ ।।Reference:TatvarthaSutra_KailashChand_Shastri_तत्वार्थसूत्र पंडित कैलाशचंद्र शास्त्री

English Meaning:

The effect of giving of the gift – dāna – has distinctions based on the specific manner in which it is given – vidhiviśesa, the specific thing given – dravyaviseṣa, the specific nature of the giver – dātṛviseṣa, and the specific nature of the recipient – pātraviseṣa. Reference:Tatvartha-Sutra-तत्वार्थ-सूत्र-Vijay-K-Jain


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दान के फल में विशेषता के कारण
flowchart TD

A["दान के फल में विशेषता के कारण"]

A --> B["विधि विशेष"]
A --> C["द्रव्य विशेष"]
A --> D["दाता विशेष"]
A --> E["पात्र विशेष"]

B --> B1["नवधा भक्ति में विशेषता"]

C --> C1["देय वस्तु जिससे तप, स्वाध्याय आदि की वृद्धि हो"]

D --> D1["दान देने वाला जो ईर्ष्या, खेद रहित सात गुणों से युक्त हो"]

E --> E1["दान लेने वाला मोक्ष के कारणभूत सम्यग्दर्शन आदि गुणों से युक्त हो"]

E1 --> F["उत्तम"]
E1 --> G["मध्यम"]
E1 --> H["जघन्य"]

F --> F1["मुनिराज"]
G --> G1["व्रती श्रावक"]
H --> H1["अव्रती सम्यग्दृष्टि"]

विधि विशेष

flowchart TB

A["विधि विशेष"]

A --> B["संघ/प्रतिग्रह"]
A --> C["उच्च स्थान"]
A --> D["पादप्रक्ष"]
A --> E["अर्चन"]
A --> F["प्रणाम"]
A --> G["शुद्धि रखना बोलना"]

B --> B1[" आईये पधारिये ऐसा निवेदन"]

C --> C1[" ऊँचा आसन देना"]

D --> D1[" प्रासुख जल से पैर धोना"]

E --> E1["योग्य पूजा स्तवन करना"]

F --> F1["*योग्य नमस्कार"]



G --> H["मन"]
G --> I["वचन"]
G --> J["काय"]
G --> K["भोजन की"]

Questions and Answers: शङ्का -समाधान

Answer लोक में अत्यन्त विशुद्ध मन वाले गृहस्थ के द्वारा प्रीतिपूर्वक पात्र के लिए एक बार भी किया गया दान जैसे अनन्त फल को करता है वैसे फल को गृह (घर) की अनेक झंझटों से उत्पन्न हुए पाप समूहों के द्वारा कुबड़े (शक्तिहीन) किये गये गृहस्थव्रत नहीं करते हैं। ये गृहस्थ लोग हमेशा विषय-कषाय के आधीन हैं, इससे इनके आर्त्त – रौद्र ध्यान उत्पन्न होते रहते हैं, इस कारण निश्चय रत्नत्रय रूप शुद्धोपयोग-परम धर्म का तो ठिकाना ही नहीं है। वह सम्यक्त्व पूर्वक आहार दान देता है तो परम्परा से मोक्ष प्राप्त करता है । इसलिए दान देना ही गृहस्थों का परम धर्म है ।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf

Answer जिस अभयदान से जीव का शरीर पुष्ट होता है, जैसे- समभाव से महाव्रत पुष्ट होते है। उस अभयदान के फल को कहने में कौन समर्थ है। केवलज्ञान सदृश दूसरा ज्ञान नहीं है, मोक्षसुख से बढ़कर और कोई सुख नहीं है और आहारदान से दूसरा उत्तम दान नहीं है । और जो कोई भी तीन-लोक में सुन्दर वस्तुएँ हैं वे सभी वस्तुएँ अभयदान करने वाले को लीला मात्र में शीघ्र आकर प्राप्त होती हैं।  जैसे – जल निश्चय से रुधिर को धो देता है वैसे ही अतिथियों के प्रति पूजन ( नवधा भक्ति पूर्वक आहारदान) गृहकार्यों में संचित हुए पापों को नष्ट करता है।
Reference:Tatwarth-Manjusha-Khand-2-तत्त्वार्थ-मंजूषा-खंड-2-Aryika-Shri-Vigyanmati-Mataji.pdf



Creative Credits:
Diksha Jain created this page on 6-Mar-2026

Courtesy:
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